राज्यसभा में भी खत्म होने जा रहा बसपा का प्रतिनिधित्व, रामजी गौतम का कार्यकाल अगले माह होगा पूरा

HIGHLIGHTS
- बसपा के पास वर्तमान में राज्यसभा में एक ही सांसद है
- रामजी गौतम का कार्यकाल अगले माह समाप्त होने वाला है
- राज्यसभा में उम्मीदवार भेजने के लिए कम से कम 37 वोटों की जरूरत होगी
- बसपा के पास इतने विधायक नहीं हैं कि वह अपने उम्मीदवार को जिता सके
बहुजन समाज पार्टी का अगले माह लोकसभा के बाद राज्यसभा में भी प्रतिनिधित्व खत्म हो सकता है। पार्टी के एकमात्र राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल अगले माह पूरा हो रहा है। बसपा के पास इतने विधायक नहीं हैं कि वह अपने किसी उम्मीदवार को राज्यसभा भेज सके। ऐसे में पार्टी राज्यसभा चुनाव में अपना प्रत्याशी नहीं उतारने का फैसला भी कर सकती है।
बसपा विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद विधानसभा में भी पार्टी की मौजूदगी समाप्त हो चुकी है। राज्यसभा में बसपा के किसी उम्मीदवार को भेजने के लिए कम से कम 37 वोटों की जरूरत होगी। मौजूदा परिस्थितियों में पार्टी के लिए इतनी संख्या में वोट जुटाना संभव नहीं दिख रहा है। यदि ऐसा ही रहा तो लोकसभा और राज्यसभा के साथ यूपी विधानसभा और विधान परिषद में भी बसपा का कोई सदस्य नहीं बचेगा।
करीब डेढ़ दशक से सियासी संकट में बसपा
बसपा पिछले करीब डेढ़ दशक से लगातार राजनीतिक संकट का सामना कर रही है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के 10 उम्मीदवार जीतकर संसद पहुंचे थे। उस समय बसपा ने सपा के साथ गठबंधन किया था। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा की ओर से उमाशंकर सिंह ही बलिया की रसड़ा सीट से जीत हासिल कर सके थे। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई।
चुनाव दर चुनाव बसपा के वोट प्रतिशत में भी गिरावट आई है, जिससे पार्टी के सामने राजनीतिक संकट और गहरा गया है।
राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी खतरे में
राज्यसभा चुनाव के बाद बसपा के राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे पर भी फिर सवाल खड़ा हो सकता है। बसपा की स्थापना वर्ष 1984 में कांशीराम ने की थी और वर्ष 1997 में उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला था। हालांकि पिछले साल चुनाव आयोग ने बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बरकरार रखा था।
अब अगले वर्ष यूपी समेत पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव बसपा के राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
गठबंधन से दूरी बनी चुनौती
वर्ष 2019 के बाद बसपा ने किसी भी राजनीतिक दल के साथ गठबंधन नहीं किया है। इसी वजह से राज्यसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व खत्म होने की स्थिति बन गई है। गठबंधन की स्थिति में सहयोगी दलों के वोट मिलने की संभावना रहती, लेकिन अब इसके लिए देर हो चुकी है।
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