बढ़ते वैश्विक कर्ज को हल्के में न लें, आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने दी चेतावनी

HIGHLIGHTS
- संजय मल्होत्रा ने वैश्विक वित्तीय स्थिरता पर बात की।
- पश्चिम एशिया संघर्ष के असर का भी उन्होंने जिक्र किया।
- मुद्रास्फीति के दबाव और वित्तीय कमजोरियों पर ध्यान दिलाया।
नई दिल्ली। कोविड के बाद दुनियाभर में बढ़ते कर्ज के स्तर को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने चिंता जताई है। उन्होंने वैश्विक समुदाय का ध्यान भी बढ़ते कर्ज के इस मुद्दे की ओर आकर्षित किया।
कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में वैश्विक वित्तीय स्थिरता पर बोलते हुए आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शनिवार को कहा कि वैश्विक कर्ज को हल्के में नहीं लिया जा सकता। उन्होंने कहा कि ऊंची वृद्धि के कारण इस क्षेत्र पर नजर बनाए रखना जरूरी है।
पश्चिम एशिया संघर्ष के असर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि फिलहाल व्यवस्था ने इसके झटके को सहन किया है, लेकिन माहौल चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। उनके मुताबिक, संघर्ष ने मुद्रास्फीति के दबाव के साथ व्यवस्था की कमजोरियों को भी बढ़ाया है।
आज की मजबूती कल की सुरक्षा नहीं
गवर्नर मल्होत्रा ने लंबे समय से बनी वित्तीय स्थिरता के बावजूद सतर्क रहने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि फिलहाल उन्हें तनाव के कोई स्पष्ट संकेत नजर नहीं आ रहे हैं, लेकिन “आज की मजबूती का मतलब कल की सुरक्षा नहीं हो सकता।”
उन्होंने कहा, “पिछले दो दशकों का भारत का अनुभव बताता है कि बैंकिंग और वित्तीय दबाव रातोंरात बन सकते हैं, लेकिन उन्हें सुलझाने में सालों लग जाते हैं और यह प्रक्रिया बेहद कष्टदायक होती है।”
इस दौरान उन्होंने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने पांच प्रमुख जोखिम बताए। इनमें बढ़ता वैश्विक कर्ज, खासकर एआई की मदद से किया गया परिसंपत्ति मूल्यांकन, ऊंचा लीवरेज, प्राइवेट क्रेडिट और साइबर जोखिम शामिल हैं। उनका कहना था कि ये जोखिम अलग-अलग स्तर पर शायद अभी बड़ी चिंता पैदा न करें, लेकिन इनके एक साथ मौजूद होने से वैश्विक वित्तीय ढांचे पर भारी दबाव पड़ सकता है।
बढ़ते कर्ज से कई मोर्चों पर असर
वैश्विक कर्ज के जोखिम पर संजय मल्होत्रा ने कहा कि दुनिया में जीडीपी की तुलना में कर्ज का अनुपात बढ़ा है। वहीं, परिपक्वता अवधि घट गई है और सरकारी बॉन्ड पर प्रतिफल तेजी से सख्त हुआ है।
उन्होंने कहा कि इसका असर कई स्तरों पर पड़ता है। सरकारों के लिए उधारी महंगी होने से राजकोषीय गुंजाइश कम होती है और कर्ज का गणित बिगड़ता है।
वहीं, वित्तीय परिस्थितियां सख्त होने से कंपनियों की कर्ज चुकाने की क्षमता पर दबाव बनता है। बैंकों के लिए सरकारी बॉन्ड में होने वाला नुकसान उनकी बैलेंस शीट को कमजोर कर सकता है। यह स्थिति उस समय और चुनौतीपूर्ण हो सकती है, जब संकटग्रस्त बैंकों को सहायता देने के लिए सरकारें खुद राजकोषीय दबाव में हों।
अमेरिका और भारत के कर्ज का जिक्र
आरबीआई गवर्नर का यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया की सबसे बड़ी इकोनमी अमेरिका में बढ़ते कर्ज को लेकर कई विशेषज्ञों ने हाल में चिंता जताई है। सितंबर 2026 के अंत तक अमेरिका का कुल सार्वजनिक कर्ज करीब 40.2 लाख करोड़ डॉलर था। जनता के पास कर्ज जीडीपी का लगभग 100 प्रतिशत और कुल कर्ज-जीडीपी अनुपात करीब 122-123 प्रतिशत था।
भारत का विदेशी कर्ज जून 2026 के अंत में 778.2 अरब डॉलर था। वित्त मंत्रालय ने हाल ही में कहा था कि यह जीडीपी के अनुपात में 20.8 प्रतिशत है, जो काफी नियंत्रित है।
हालांकि, दुनिया पर कुल कर्ज रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही में सरकार, कंपनियों, बैंकों और परिवारों को मिलाकर वैश्विक कर्ज 365 लाख करोड़ डॉलर से ऊपर पहुंच गया और केवल छह महीनों में इसमें करीब 10 लाख करोड़ डॉलर की बढ़ोतरी हुई।
क्रिप्टोकरेंसी पर सतर्क रुख कायम
गवर्नर मल्होत्रा ने यह भी स्पष्ट किया कि क्रिप्टोकरेंसी को लेकर आरबीआई के रुख में बदलाव नहीं आया है और भारत इस मामले में सतर्क दृष्टिकोण बनाए हुए है। हालांकि, टोकनाइजेशन जैसी तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
मल्होत्रा ने कहा कि केंद्रीय बैंक और बाहर पीपीपी मोड में इनमें से कुछ तकनीकों का उपयोग हो रहा है, लेकिन क्रिप्टो को लेकर सावधानीपूर्ण रुख अपनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इससे जुड़ी कई तरह की चिंताएं हैं, जिनमें एकल मुद्रा का प्रचलन और पूंजी प्रवाह पर असर जैसी बातें शामिल हैं।
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