न्यूजक्लिक मनी लॉन्ड्रिंग केस: हाईकोर्ट के फैसले को ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

HIGHLIGHTS
- हाईकोर्ट ने कहा था कि संबंधित अवधि में डिजिटल मीडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर कोई सीमा या प्रतिबंध नहीं था।
- अदालत के मुताबिक, जांच के दौरान आपराधिक साजिश के आरोपों के समर्थन में कोई आपत्तिजनक सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं रखी गई।
- सुप्रीम कोर्ट में ईडी की याचिका अभी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई है।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें न्यूज पोर्टल न्यूजक्लिक और उसके प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नियमों के उल्लंघन से जुड़े धनशोधन मामले को रद्द कर दिया गया था।
ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा है कि हाईकोर्ट ने धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत मामले की जांच किए बिना ही प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) रद्द कर दी। एजेंसी ने फैसले के लिए पांच महीने का समय लगाए जाने पर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि, अभी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया गया है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 29 मई को इस मामले में फैसला सुनाया था। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने कहा था कि दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा दर्ज प्राथमिकी को जारी रखना 'कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग' था। अदालत के अनुसार, जब मूल अपराध से संबंधित प्राथमिकी ही रद्द कर दी गई, तो ईडी की ईसीआईआर भी समाप्त होनी चाहिए।
क्या था विदेशी निवेश से जुड़ा आरोप?
दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने वर्ष 2020 में इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की थी। इसमें न्यूजक्लिक की मूल कंपनी पीपीके न्यूजक्लिक स्टूडियो प्राइवेट लिमिटेड पर आरोप लगाए गए थे।
प्राथमिकी के मुताबिक, कंपनी को वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान अमेरिका की वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी से 9.59 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मिला था। आरोप था कि यह निवेश विदेशी निवेश से जुड़े कानूनों का उल्लंघन करके किया गया, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा।
प्राथमिकी में शेयरों का मूल्य बढ़ाकर दिखाने का आरोप भी लगाया गया था। दावा था कि ऐसा डिजिटल समाचार वेबसाइट में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की 26 प्रतिशत सीमा से बचने के लिए किया गया।
इसके अलावा, आरोप लगाया गया कि निवेश की 45 प्रतिशत से अधिक राशि दूसरी जगह भेज दी गई या निकाल ली गई। इस रकम को वेतन, परामर्श शुल्क और किराये जैसे खर्चों के तौर पर दर्शाया गया था।
इसके बाद ईडी ने न्यूजक्लिक, प्रबीर पुरकायस्थ और अन्य लोगों के खिलाफ धनशोधन का मामला दर्ज किया। पीपीके न्यूजक्लिक स्टूडियो ने प्राथमिकी रद्द करने की मांग करते हुए कहा था कि इसमें लगाए गए आरोप स्पष्ट नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया मामला?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि निवेश करना एक आर्थिक निर्णय था और केवल इस आधार पर किसी आपराधिक अपराध का संकेत नहीं मिलता।
अदालत ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के जवाब का भी उल्लेख किया था। मंत्रालय ने समाचार पोर्टल के पत्र के जवाब में बताया था कि संबंधित अवधि में डिजिटल मीडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर कोई सीमा या प्रतिबंध नहीं था।
हाईकोर्ट ने माना था कि निवेश स्वीकार्य तरीकों से किया गया था। अदालत के अनुसार, यदि सभी आरोपों को सही भी मान लिया जाए, तब भी धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात का अपराध साबित नहीं होता।
अदालत ने कहा था कि धोखाधड़ी के मामले में किसी व्यक्ति का ठगा जाना आवश्यक है। इस मामले में वह व्यक्ति वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी होनी चाहिए थी, लेकिन कंपनी ने ऐसी कोई शिकायत नहीं की थी। शिकायत केवल एक सूचना देने वाले व्यक्ति की ओर से दर्ज कराई गई थी।
खर्चों से जुड़े आरोपों पर भी अदालत ने टिप्पणी की थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि डिजिटल समाचार कारोबार चलाने वाली कंपनी को वेतन, परामर्श शुल्क और किराये जैसे खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में इन खर्चों के आधार पर धन की हेराफेरी का आरोप टिकाऊ नहीं था।
आपराधिक साजिश के आरोप पर क्या कहा था?
हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत आपराधिक साजिश के आधार पर धनशोधन का मामला जारी रखने की ईडी की दलील भी खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा था कि जांच एजेंसी को यह बताना होगा कि न्यूजक्लिक और अन्य लोगों ने अपराध करने के लिए कौन-सा 'गैरकानूनी उद्देश्य' अपनाया था और इसके लिए किन 'तरीकों' का इस्तेमाल किया गया।
अदालत ने कहा था, 'खास बात यह है कि ईडी ने करीब डेढ़ साल तक व्यापक जांच की। याचिकाकर्ताओं और उनके कर्मचारियों को कई बार बुलाकर पूछताछ की गई। लेकिन आज तक कोई भी आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली और न ही अदालत के रिकॉर्ड पर रखी गई।'
हाईकोर्ट ने आगे कहा था, 'आपराधिक साजिश के केवल सामान्य आरोपों के अलावा कोई ऐसा आपत्तिजनक आरोप नहीं है, जो दूर-दूर तक भी पीएमएलए की धारा 4 के तहत दंडनीय अपराध किए जाने का संकेत देता हो।'
हाईकोर्ट ने प्राथमिकी संख्या 0116/2020 और ईसीआईआर संख्या ईसीआईआर/14/एचआईयू/2020 को रद्द कर दिया था। अदालत ने यह भी कहा था कि जब ईसीआईआर ही रद्द कर दी गई है, तो उसकी प्रति उपलब्ध कराने की मांग का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
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