करूर भगदड़ पीड़ित परिवारों को सरकारी नौकरी पर HC की मंजूरी, अस्थायी रहेंगी नियुक्तियां

HIGHLIGHTS
- मद्रास हाई कोर्ट ने करूर भगदड़ में मृतकों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को मंजूरी दे दी है।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सभी नियुक्तियां फिलहाल अस्थायी होंगी और आगे न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहेंगी।
- हाई कोर्ट ने तमिलनाडु लोक सेवा आयोग से सहानुभूति के आधार पर नियुक्तियों के नियमों और प्रक्रिया पर रिपोर्ट मांगी है।
मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को करूर भगदड़ हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने की अनुमति दे दी है। हालांकि अदालत ने इन नियुक्तियों को फिलहाल अस्थायी रखने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये नियुक्तियां न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहेंगी और अंतिम फैसला मामले की आगे की सुनवाई के बाद लिया जाएगा।
मदुरै पीठ के जस्टिस सीवी कार्तिकेयन और जस्टिस आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने कहा कि किसी नीतिगत फैसले में हस्तक्षेप करना अदालत के लिए सीमित दायरे का विषय है। इसी आधार पर कोर्ट ने सरकार को शुक्रवार दोपहर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में पीड़ित परिवारों को नियुक्ति पत्र सौंपने की अनुमति प्रदान कर दी।
कोर्ट ने रखी यह शर्त
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि राज्य सरकार नियुक्तियां कर सकती है, लेकिन ये नियुक्तियां स्थायी नहीं मानी जाएंगी। अदालत ने निर्देश दिया कि इन पर आगे होने वाली न्यायिक समीक्षा का असर रहेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने का प्रयास किया जाएगा, ताकि नियुक्ति पाने वालों को वेतन मिलने से पहले ही कानूनी स्थिति स्पष्ट हो सके।
पब्लिक सर्विस कमीशन से मांगी रिपोर्ट
मामले में हाई कोर्ट ने तमिलनाडु लोक सेवा आयोग के सदस्य सचिव को भी पक्षकार बनाया है। अदालत ने उनसे सहानुभूति के आधार पर सरकारी नौकरी देने से जुड़े नियमों और दिशानिर्देशों की जानकारी मांगी है। साथ ही यह बताने को कहा गया है कि करूर भगदड़ पीड़ित परिवारों को नियुक्ति देने में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया है या नहीं।
सरकार के फैसले को दी गई थी चुनौती
यह मामला मदुरै के वकील थीरन थिरुमुरुगन की याचिका पर सामने आया। याचिका में मुख्यमंत्री विजय की अगुवाई वाली सरकार के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें करूर भगदड़ में मारे गए 41 लोगों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का निर्णय लिया गया था।
याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले का निपटारा होने तक इन नियुक्तियों पर रोक लगाई जाए।
याचिकाकर्ता ने उठाए संवैधानिक सवाल
याचिकाकर्ता की दलील थी कि किसी विशेष हादसे के आधार पर सरकारी नौकरी देने के लिए कोई स्पष्ट और समान नीति मौजूद नहीं है। उन्होंने कहा कि इस तरह की नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और सरकारी नौकरियों में समान अवसर के अधिकार से जुड़े सवाल खड़े करती हैं।
उनका तर्क था कि सरकारी नौकरी के लिए सभी योग्य उम्मीदवारों को प्रतिस्पर्धा का समान अवसर मिलना चाहिए और बिना स्पष्ट नियमों के की गई नियुक्तियां मनमानी मानी जा सकती हैं।
सरकार ने दिया पुरानी घटनाओं का हवाला
राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले में सरकारी नौकरी पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका बाद में वापस ले ली गई थी। सरकार ने थूथुकुडी पुलिस फायरिंग मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि उस घटना में भी मृतकों के परिवारों को नौकरी दी गई थी।
हालांकि हाई कोर्ट ने कहा कि थूथुकुडी और करूर की परिस्थितियां अलग हैं। अदालत ने बताया कि थूथुकुडी मामला पुलिस कार्रवाई से जुड़ा था, जबकि करूर भगदड़ को उसी श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
करूर भगदड़ मामला
पिछले साल सितंबर में करूर में हुई भगदड़ में 41 लोगों की मौत हुई थी। हादसे के बाद राज्य सरकार ने मृतकों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने का फैसला लिया था, जिस पर अब हाई कोर्ट ने शर्तों के साथ आगे बढ़ने की अनुमति दी है।
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