जैसलमेर में अपाचे हेलिकॉप्टर का बड़ा अभ्यास, 30 एमएम गन से ड्रोन को हवा में किया नष्ट

HIGHLIGHTS
- अभ्यास में बंशी जेट 40 प्लस ड्रोन को हवाई लक्ष्य बनाया गया।
- पायलट ने लक्ष्य की दिशा और स्थिति का आकलन कर फायरिंग की।
- ड्रोन को नष्ट करने के लिए अपाचे की अपनी गन प्रणाली का इस्तेमाल हुआ।
जैसलमेर। राजस्थान के सीमावर्ती जैसलमेर में भारतीय सेना की कॉम्बैट एविएशन क्षमता से संबंधित एक महत्वपूर्ण अभ्यास किया गया। आर्मी एविएशन कॉर्प्स की वैलिएंट विंग्स स्क्वाड्रन ने AH-64E अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर की गन सिस्टम क्षमता का परीक्षण किया। अभ्यास के दौरान अपाचे ने अपनी इन-बिल्ट 30 एमएम चेन गन से हवा में उड़ रहे मानवरहित ड्रोन को निशाना बनाया और उड़ान के दौरान ही उसे नष्ट कर दिया।
यह अभ्यास ऐसे वक्त में हुआ है, जब आधुनिक युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। छोटे आकार और अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर उड़ने वाले मानवरहित प्लेटफॉर्म निगरानी से लेकर हमले तक के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ऐसे में लड़ाकू हेलिकॉप्टर की अपनी गन प्रणाली से हवाई लक्ष्य की तुरंत पहचान कर उस पर कार्रवाई करने की क्षमता का परीक्षण सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
हवा में उड़ते लक्ष्य को बनाया निशाना
अभ्यास में बंशी जेट 40 प्लस मानवरहित ड्रोन को हवाई लक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल किया गया। तय प्रक्रिया के अनुसार ड्रोन को आसमान में उड़ाया गया, जिसके बाद अपाचे हेलिकॉप्टर ने उसे लक्ष्य बनाया। पायलट ने लक्ष्य की दिशा और स्थिति का आकलन करने के बाद हेलिकॉप्टर की 30 एमएम चेन गन से फायरिंग की।
फायरिंग के बाद ड्रोन हवा में ही नष्ट हो गया। पूरी कार्रवाई में अपाचे की अपनी गन प्रणाली का इस्तेमाल किया गया। खास बात यह रही कि लक्ष्य को नष्ट करने के लिए किसी नई मिसाइल या अलग से लगाई गई बाहरी हथियार प्रणाली का उपयोग नहीं किया गया।
क्यों महत्वपूर्ण है यह परीक्षण?
आधुनिक युद्ध में ड्रोन एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आए हैं। इनका इस्तेमाल निगरानी, टारगेट की पहचान, संचार और कई मामलों में हमले के लिए भी किया जा सकता है। छोटी बनावट, तेजी से दिशा बदलने की क्षमता और अपेक्षाकृत कम लागत के कारण ड्रोन पारंपरिक हवाई लक्ष्यों से अलग तरह की चुनौती पेश करते हैं।
ऐसे हालात में युद्धक हेलिकॉप्टर में मौजूद गन सिस्टम का प्रभावी इस्तेमाल महत्वपूर्ण हो सकता है। जैसलमेर में किया गया अभ्यास इसी क्षमता को व्यावहारिक परिस्थितियों में जांचने की दिशा में देखा जा रहा है।
अभ्यास के दौरान यह परखा गया कि अपाचे हेलिकॉप्टर हवा में मौजूद मानवरहित लक्ष्य की कितनी तेजी से पहचान कर उस पर कार्रवाई कर सकता है। इसके साथ ही पायलट और हथियार प्रणाली के बीच तालमेल तथा लक्ष्य पर सटीक फायरिंग की क्षमता का भी परीक्षण किया गया।
अपाचे की भूमिका सिर्फ जमीनी हमले तक सीमित नहीं
AH-64E अपाचे को मुख्य रूप से जमीनी सैन्य लक्ष्यों के खिलाफ कार्रवाई के लिए विकसित किया गया है। यह हेलिकॉप्टर बख्तरबंद वाहनों और अन्य महत्वपूर्ण जमीनी लक्ष्यों पर हमला करने की क्षमता के लिए जाना जाता है। इसके हथियार और सेंसर सिस्टम युद्ध क्षेत्र में लक्ष्यों की पहचान और उन पर कार्रवाई करने में सक्षम बनाते हैं।
हेलिकॉप्टर में लगी 30 एमएम चेन गन भी इसकी प्रमुख हथियार प्रणालियों में शामिल है। जैसलमेर के अभ्यास में इसी गन सिस्टम का इस्तेमाल हवाई मानवरहित लक्ष्य के खिलाफ किया गया और इसकी उपयोगिता को परखा गया।
जैसलमेर में ही क्यों हुआ अभ्यास?
जैसलमेर का रेगिस्तानी क्षेत्र भारतीय सेना के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। पश्चिमी सीमा से लगे इस इलाके में सेना नियमित रूप से अलग-अलग प्रकार के प्रशिक्षण और युद्धाभ्यास करती है। रेगिस्तानी भूभाग सैन्य प्लेटफॉर्म की क्षमता, पायलटों की प्रतिक्रिया और हथियार प्रणालियों के प्रदर्शन को वास्तविक परिस्थितियों के करीब जांचने का अवसर देता है।
इसी कारण जैसलमेर में होने वाले ऐसे अभ्यासों का महत्व केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहता। इनके जरिए सेना को अलग-अलग परिस्थितियों में अपने प्लेटफॉर्म और हथियार प्रणालियों की वास्तविक क्षमता का आकलन करने में मदद मिलती है।
ड्रोन चुनौती के बीच ऐसी क्षमताओं की बढ़ी जरूरत
दुनिया भर में युद्ध के बदलते स्वरूप के साथ ड्रोन का महत्व लगातार बढ़ा है। पारंपरिक लड़ाकू विमानों और हेलिकॉप्टरों के साथ छोटे मानवरहित हवाई प्लेटफॉर्म भी अब युद्ध क्षेत्र का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में किसी भी सैन्य बल के लिए ड्रोन की पहचान और उनसे निपटने की क्षमता महत्वपूर्ण होती जा रही है।
जैसलमेर में किया गया यह अभ्यास इसी बदलती युद्ध रणनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यहां किसी नई मिसाइल प्रणाली का परीक्षण करने के बजाय पहले से उपलब्ध अपाचे के गन सिस्टम को हवाई लक्ष्य के खिलाफ इस्तेमाल किया गया। इससे यह परखा गया कि जरूरत पड़ने पर हेलिकॉप्टर अपनी मौजूदा हथियार क्षमता का इस्तेमाल करते हुए ड्रोन जैसे लक्ष्य के खिलाफ कितनी प्रभावी कार्रवाई कर सकता है।
वैलिएंट विंग्स स्क्वाड्रन की भूमिका
वैलिएंट विंग्स भारतीय सेना के आर्मी एविएशन कॉर्प्स की अपाचे स्क्वाड्रन है। यह सेना की कॉम्बैट एविएशन क्षमता का हिस्सा है। अपाचे जैसे अटैक हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल सेना के जमीनी अभियानों को हवाई सहायता देने, महत्वपूर्ण लक्ष्यों पर कार्रवाई करने और युद्ध क्षेत्र में जरूरी फायरपावर उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है।
जैसलमेर में हुआ यह अभ्यास इस बात का उदाहरण है कि सेना अपने मौजूदा प्लेटफॉर्म की क्षमताओं को अलग-अलग परिस्थितियों में लगातार परख रही है। हवा में ड्रोन को निशाना बनाना इसी प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
अभ्यास से मिला महत्वपूर्ण परिचालन अनुभव
इस परीक्षण के जरिए पायलटों को मानवरहित हवाई लक्ष्य के खिलाफ हेलिकॉप्टर की गन प्रणाली के इस्तेमाल का व्यावहारिक अनुभव मिला। इसके अलावा लक्ष्य की पहचान, निशाना साधने और निर्धारित हथियार प्रणाली से सटीक फायरिंग की प्रक्रिया भी परखी गई।
हालांकि यह अभ्यास किसी नई मिसाइल या बाहरी हथियार प्रणाली के परीक्षण के लिए नहीं था, लेकिन इसका महत्व कम नहीं है। यह सेना की उस तैयारी को दर्शाता है, जिसमें मौजूदा हथियार प्रणालियों का जरूरत के अनुसार अलग-अलग प्रकार के लक्ष्यों के खिलाफ प्रभावी इस्तेमाल करने की क्षमता विकसित की जा रही है।
जैसलमेर के आसमान में हुए इस परीक्षण से यह सामने आया कि बदलते युद्ध क्षेत्र में भारतीय सेना अपने लड़ाकू हेलिकॉप्टरों की क्षमताओं को लगातार नए परिचालन परिदृश्यों के अनुरूप परख रही है। हवा में उड़ रहे ड्रोन को 30 एमएम चेन गन से नष्ट करने की कार्रवाई के दौरान अपाचे की त्वरित प्रतिक्रिया और सटीक फायरिंग क्षमता का प्रदर्शन किया गया।
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