ट्रंप की ईरान को चेतावनी, 'समझौते का सबसे बड़ा मौका गंवाया'; अब होगी कड़ी आर्थिक कार्रवाई

HIGHLIGHTS
- ट्रंप ने ईरान के साथ समझौते का मौका गंवाने का आरोप लगाया।
- ईरान की नौसेना और वायु सेना को लेकर ट्रंप ने बड़ा दावा किया।
- तेल तस्करी और नकद लेनदेन रोकने की बात कही गई।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे सख्त आर्थिक कार्रवाई की धमकी दी है। उन्होंने कहा कि ईरान के पास अमेरिका के साथ समझौता करने का सबसे बड़ा मौका था, लेकिन उसने इसे गंवा दिया।
ट्रंप ने कहा कि इस्लामी गणराज्य ईरान को समझौते के लिए उनसे बड़ा मौका किसी ने नहीं दिया। उन्होंने कहा कि ईरान ने इस अवसर का लाभ नहीं उठाया। इसके बाद वह किसी भी देश के खिलाफ अब तक की सबसे कड़ी आर्थिक कार्रवाई की घोषणा कर रहे हैं। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की नौसेना खत्म हो चुकी है और उसकी वायु सेना नष्ट हो गई है। उन्होंने कहा कि उसकी सैन्य फैक्टरियां मलबे में बदल गई हैं, मुद्रा बेकार हो गई है और देश बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच गया है।
ईरान की मदद करने वाले देशों पर भी कार्रवाई की चेतावनी
ट्रंप ने कहा कि जो भी देश ईरान को किसी भी तरह की आर्थिक मदद देगा, उसे भी बड़े आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ेगा। इसमें वित्तीय संस्थान, कारोबार, हवाई अड्डे और सरकारी संस्थाएं शामिल हैं।
उन्होंने तेल की तस्करी, स्वैप लाइन, नकद लेनदेन, एक्सचेंज हाउस, जहाजों के पंजीकरण और ईरान की मदद करने वाली छिपी हुई शेल कंपनियों को तुरंत रोकने की बात कही।
सहयोगी देशों से अमेरिका का साथ देने की अपील
ट्रंप ने इसे ईरान के खिलाफ बड़े आर्थिक हमले का दिन बताया। उन्होंने अमेरिका के सहयोगी देशों से ईरान को अलग-थलग करने और उसके खतरे को खत्म करने में साथ देने की अपील की।
उन्होंने कहा कि ईरान इस समय बेहद कमजोर स्थिति में है। उनका दावा है कि ये ऐतिहासिक कदम ईरान और दुनियाभर में आतंक फैलाने की उसकी क्षमता को बुरी तरह कमजोर कर देंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि ईरान के पास कभी परमाणु हथियार नहीं होगा।
अमेरिका ने ईरान पर बढ़ाया आर्थिक दबाव
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भी पिछले हफ्ते इसी तरह का बयान दिया था। बेसेंट ने कहा था कि अमेरिका ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के प्रयास बढ़ाएगा। इस रणनीति में अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी भी शामिल है।
अमेरिकी वित्त मंत्रालय 'ऑपरेशन इकोनॉमिक फ्यूरी' नाम से प्रतिबंध अभियान भी चला रहा है। इसका उद्देश्य लक्षित कार्रवाई के जरिए ईरान के पैसे जुटाने के स्रोतों को बंद करना है।
ईरान के खिलाफ युद्ध कब शुरू हुआ?
युद्ध की शुरुआत 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इस्राइल के हमलों के साथ हुई। इसके जवाब में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए।
कौन-कौन से देश ईरान के साथ?
रिपोर्ट के मुताबिक, रूस ने ईरान को सैन्य उपकरण और ड्रोन से जुड़ी तकनीक उपलब्ध कराई है। वहीं, चीन लगातार ईरान से तेल खरीद रहा है। चीन ने ईरान के साथ कारोबारी रिश्ते बनाए रखे हैं और उसे कूटनीतिक समर्थन भी दिया है।
पाकिस्तान ने कूटनीति और बातचीत शुरू कराने की कोशिशों के जरिए ईरान का समर्थन किया है। हालांकि, उसने ईरान को सैन्य मदद नहीं दी है।
रॉयटर्स के मुताबिक, ईरान को उसके सहयोगी हथियारबंद समूहों का भी समर्थन हासिल है। इनमें यमन के हूती और इराक में ईरान से जुड़े लड़ाके शामिल हैं।
ट्रंप ने इससे पहले कहा था कि अमेरिका के पास ईरान के खिलाफ 'बहुत कड़े प्रतिबंध' लगाने के विकल्प मौजूद हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ट्रंप ने दावा किया कि अभी जलडमरूमध्य खुला है और वहां से बहुत सारी नावें गुजर रही हैं।
भारत पर क्या हो सकता है असर?
भारत पर इसका असर तेल और गैस की कीमतों, नौवहन और महंगाई के रूप में पड़ सकता है। होर्मुज में तनाव बढ़ने से भारत की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा, ईरान पर अमेरिकी दबाव बढ़ने से भारत के चाबहार बंदरगाह से जुड़ी योजनाओं पर भी असर पड़ने का खतरा है। चाबहार भारत के लिए ईरान के रास्ते अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का अहम मार्ग है। हालांकि, अमेरिकी प्रतिबंध और मौजूदा संघर्ष पहले ही इसके कामकाज पर दबाव डाल रहे हैं।
Comments0
Leave a comment
Join the conversation — your email will not be published.


















Reader comments
No comments yet
Be the first to share your perspective on this story.