Gen Z के वोट को लेकर कांग्रेस का पीएम मोदी पर हमला, राजीव गांधी के फैसले का किया जिक्र

HIGHLIGHTS
- राजीव गांधी सरकार ने 1988 में मतदान की उम्र घटाई थी।
- संविधान के अनुच्छेद 326 में संशोधन किया गया था।
- मतदान की न्यूनतम उम्र 21 से घटाकर 18 वर्ष हुई थी।
कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के 1988 के उस फैसले का जिक्र किया, जिसके तहत मतदान की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई थी। कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि एक प्रधानमंत्री ने युवाओं को मतदान का अधिकार दिया, जबकि दूसरा Gen Z से यह अधिकार "हथियाने" की कोशिश कर रहा है।
जयराम रमेश ने कहा कि दिसंबर 1988 में राजीव गांधी सरकार ने संसद के नियमित शीतकालीन सत्र के दौरान संविधान के अनुच्छेद 326 में संशोधन कर मतदान की न्यूनतम आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दी थी। उन्होंने इसे युवाओं को सशक्त बनाने वाला कदम बताया।
पीएम मोदी पर कांग्रेस ने क्या आरोप लगाए?
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि 2024 से मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SSR) को दोबारा शुरू नहीं किया गया है। उनका कहना है कि इसके चलते Gen Z के नए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पा रहे हैं।
उन्होंने कहा, "एक प्रधानमंत्री ने Gen Z को वोट दिया, जबकि दूसरा इसे छीनने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल करने पर तुला हुआ है।"
चुनाव आयोग पर कांग्रेस ने उठाए सवाल
कांग्रेस ने गुरुवार को आरोप लगाया था कि Gen Z को मतदाता सूची से बाहर रखने के लिए निशाना बनाया जा रहा है। पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग भी की थी। विपक्षी दल ने यह भी कहा था कि उसके अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को इस "साजिश" के लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा।
जयराम रमेश ने आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री यह सुनिश्चित करने पर जोर दे रहे हैं कि Gen Z मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज न हों। उन्होंने दावा किया कि युवाओं में सरकार के प्रति असंतोष को देखते हुए चुनाव आयोग के प्रमुख के जरिए उन्हें मतदाता सूची से दूर रखने का प्रयास किया जा रहा है।
रमेश के मुताबिक, हर साल मतदाता सूची में संशोधन के लिए होने वाला SSR रोक दिया गया है। उन्होंने कहा कि इसी प्रक्रिया के जरिए खासकर 18 वर्ष की उम्र पूरी करने वाले नए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में जोड़े जाते हैं। उनका दावा था कि दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने SSR दोबारा शुरू करने की जोरदार मांग की थी, लेकिन पिछले दो वर्षों से मतदाता सूची में यह पुनरीक्षण नहीं हुआ है।
चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को लेकर क्या है विवाद?
द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों में ऐसे फैसलों और आदेशों को लेकर सवाल उठाए गए, जिन्हें दोनों अधिकारियों ने अपनी जानकारी के बिना जारी किए जाने की बात कही थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, मतदाता सूची के डेटाबेस तक पहुंच तथा फॉर्म 6 में बदलाव सहित कई मुद्दों से जुड़ी थीं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि राष्ट्रीय स्तर पर विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया चुनाव आयोग की निगरानी में चल रही थी और इसी दौरान संधू तथा जोशी ने अलग-अलग मामलों में आपत्तियां दर्ज की थीं।
चुनाव आयोग ने क्या सफाई दी?
इन रिपोर्टों के बाद चुनाव आयोग ने कहा कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए हैं। आयोग ने कहा कि अलग-अलग विचार, टिप्पणियां और सुझाव किसी भी संस्था में होने वाली विचार-विमर्श प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं।
चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि संधू और जोशी की ओर से उठाए गए मुद्दे निर्णय प्रक्रिया के दौरान दिए गए सुझाव और टिप्पणियों का हिस्सा थे तथा अंतिम फैसले आयोग ने सर्वसम्मति से लिए।
Comments0
Leave a comment
Join the conversation — your email will not be published.




























Reader comments
No comments yet
Be the first to share your perspective on this story.