तमिलनाडु के सरकारी अस्पतालों में दवा के कवर पर हिंदी से विवाद, इस्तेमाल पर लगी रोक

HIGHLIGHTS
- करूर अस्पताल में हिंदी वाले दवा कवर की तस्वीरें सामने आईं।
- डीएमके नेता टीआरबी राजा ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया।
- दिसंबर 2025 में ईरोड की सहकारी प्रिंटिंग प्रेस से कवर मंगाए गए थे।
तमिलनाडु में हिंदी भाषा को लेकर एक बार फिर विवाद सामने आया है। इस बार मामला सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दी जाने वाली दवाओं के कवर से जुड़ा है। करूर और कोयंबटूर के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में इस्तेमाल किए जा रहे कुछ दवा कवर पर दवा लेने का समय और उसकी खुराक से संबंधित निर्देश तमिल और अंग्रेजी के अलावा हिंदी में भी छपे मिले। मामला सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन ने इन कवर के इस्तेमाल पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
विवाद उस समय सामने आया जब डीएमके नेता टीआरबी राजा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर करूर के सरकारी अस्पताल में इस्तेमाल हो रहे दवा के कवर की तस्वीरें साझा कीं। उन्होंने सवाल किया कि क्या तमिलनाडु के अस्पतालों में भी तीन भाषा नीति लागू की जा रही है।
राजा ने अपने पोस्ट में लिखा, 'ऐसा लगता है कि तमिलनाडु के अस्पतालों में भी तीन भाषा नीति लागू की जा रही है! पहले करूर, अब कोयंबटूर में भी यही स्थिति है।'
अस्पतालों में हिंदी वाले कवर कैसे पहुंचे?
करूर मेडिकल कॉलेज अस्पताल के डीन डॉक्टर एम. भारती मोहन के अनुसार, अस्पताल में सामान्य तौर पर मदुरै जेल से तैयार कराए गए सादे भूरे कवर का इस्तेमाल होता है। इन कवर पर अस्पताल की फार्मेसी में रबर स्टांप के जरिए तमिल में दवा लेने का समय दर्ज किया जाता है।
कवर की कमी होने के कारण दिसंबर 2025 में ईरोड की एक सहकारी प्रिंटिंग प्रेस से कवर मंगवाए गए थे। डीन ने बताया कि अस्पताल की ओर से इन कवर पर किसी भाषा में कुछ छापने का निर्देश नहीं दिया गया था। हालांकि, बड़े आकार के कवर पर प्रिंटिंग प्रेस ने अपनी ओर से दवा की खुराक और उसके इस्तेमाल से जुड़े शब्द छाप दिए।
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि इन कवर पर छपी हिंदी पर उस समय ध्यान नहीं गया। सोशल मीडिया पर मामला सामने आने के बाद इनके इस्तेमाल को रोक दिया गया।
कोयंबटूर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में क्या हुआ?
कोयंबटूर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी हिंदी वाले इसी तरह के कवर इस्तेमाल किए जा रहे थे। विवाद सामने आने के बाद अस्पताल ने इन कवर को हटाकर दोबारा सादे कवर का इस्तेमाल शुरू कर दिया।
अधिकारियों के मुताबिक, अब मरीजों को दवा देने से पहले कवर पर दवा की खुराक और उसे लेने का तरीका हाथ से स्टांप किया जाएगा। स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया कि दवा की खुराक से जुड़ी जानकारी कवर पर छपना सामान्य व्यवस्था है। कोयंबटूर में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर रहते हैं, इसलिए अधिकारियों के अनुसार ऐसी जानकारी उनके लिए उपयोगी हो सकती है।
हालांकि, अस्पताल के कुछ फार्मासिस्टों ने सादे कवर की व्यवस्था पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि अगर जानकारी केवल तमिल और अंग्रेजी में होगी तो कुछ प्रवासी मजदूरों को दवा की खुराक समझाने में अतिरिक्त समय लग सकता है। अस्पताल पहले से ही कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है।
तमिलनाडु में हिंदी को लेकर विवाद की वजह क्या है?
इस विवाद को समझने के लिए तमिलनाडु की दो भाषा नीति को देखना जरूरी है। राज्य में लंबे समय से तमिल और अंग्रेजी के इस्तेमाल की नीति चली आ रही है। राज्य सरकारें केंद्र की तीन भाषा नीति का विरोध करती रही हैं। ऐसे में सरकारी संस्थानों में हिंदी का इस्तेमाल राजनीतिक मुद्दा बन जाता है।
दवा के कवर का यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब कुछ दिन पहले ही तूतीकोरिन जिले के सातानकुलम के पास राज्य राजमार्ग-93 के एक दिशा-सूचक बोर्ड पर तमिल और अंग्रेजी के साथ हिंदी भी लिखी मिली थी। विवाद के बाद बोर्ड से हिंदी हटा दी गई थी और राज्य सरकार ने इस मामले में दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया था।
विवाद के बाद सरकार ने क्या कदम उठाया?
स्वास्थ्य मंत्री केजी अरुणराज ने कहा कि मौजूदा सरकार ने इन कवर के डिजाइन या भाषा में कोई बदलाव नहीं किया था। उन्होंने बताया कि करूर में दिसंबर 2025 में कवर की खरीद पिछली डीएमके सरकार के कार्यकाल में हुई थी। वहीं, कोयंबटूर में भी इसी तरह के कवर पहले से इस्तेमाल किए जा रहे थे।
मंत्री ने कहा कि मामला सामने आने के बाद सरकार ने दोनों अस्पतालों में विवादित कवर का इस्तेमाल रोक दिया है।
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