राम मंदिर ट्रस्ट की बैठक में फैसला, डॉ. कृष्ण मोहन संभालेंगे महासचिव का कार्यभार

HIGHLIGHTS
- राम मंदिर ट्रस्ट की ढाई घंटे चली बैठक में प्रशासनिक और संगठनात्मक विषयों पर चर्चा की गई।
- बैठक में फैसला लिया गया कि डॉ. कृष्ण मोहन अगले निर्णय तक ट्रस्ट के महासचिव का कार्यभार संभालेंगे।
- डॉ. कृष्ण मोहन ने राम चढ़ावा चोरी मामले में तहरीर दी थी और वे भारतीय वन सेवा से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं।
राम मंदिर ट्रस्ट की महत्वपूर्ण बैठक मंगलवार को संपन्न हुई। करीब ढाई घंटे चली इस बैठक में ट्रस्ट से जुड़े प्रशासनिक और संगठनात्मक मुद्दों पर चर्चा की गई। बैठक खत्म होने के बाद ट्रस्ट के सदस्य वापस रवाना हो गए।
बैठक में लिए गए प्रमुख फैसले के अनुसार, डॉ. कृष्ण मोहन फिलहाल राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव का कार्यभार संभालेंगे। यह व्यवस्था अगले निर्णय तक जारी रहेगी। बैठक में मंदिर निर्माण, ट्रस्ट के प्रशासनिक कार्यों और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर भी विचार-विमर्श किया गया। हालांकि बैठक में हुई अन्य चर्चाओं और निर्णयों की विस्तृत जानकारी अभी सामने नहीं आई है। ट्रस्ट की ओर से जल्द ही आधिकारिक जानकारी जारी किए जाने की संभावना है।
राम मंदिर ट्रस्ट की इस बैठक पर देशभर के श्रद्धालुओं और प्रदेश के लोगों की नजर थी। डॉ. कृष्ण मोहन को महासचिव का कार्यभार सौंपने के फैसले को ट्रस्ट के कामकाज में निरंतरता बनाए रखने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
राम चढ़ावा चोरी मामले में कृष्ण मोहन ने दी थी तहरीर
उत्तर प्रदेश के हरदोई निवासी ट्रस्टी डॉ. कृष्ण मोहन को ट्रस्ट के महासचिव की जिम्मेदारी दी गई है। अब वे ट्रस्ट के प्रशासनिक और संगठनात्मक कार्यों को संभालेंगे। बता दें कि राम चढ़ावा चोरी मामले में तहरीर डॉ. कृष्ण मोहन ने ही दी थी।
डॉ. कृष्ण मोहन का संबंध उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले से है। उन्होंने 1970 के दशक में लखनऊ विश्वविद्यालय से एमएससी की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उनका चयन भारतीय वन सेवा (आईएफएस) में हुआ और उन्होंने महाराष्ट्र कैडर में लंबे समय तक सेवाएं दीं।
सेवानिवृत्ति के बाद डॉ. कृष्ण मोहन सामाजिक और जनसेवा के कार्यों से जुड़े रहे। उनका जन्म सितंबर 1952 में बरेली में हुआ था। उनके पिता रेलवे में अधिकारी थे। हरदोई जिले के शाहाबाद क्षेत्र के सिकंदरपुर बाजार निवासी कृष्ण मोहन ने लखनऊ विश्वविद्यालय से एमएससी की पढ़ाई पूरी की।
इसके बाद उन्होंने करीब पांच साल तक एटॉमिक एनर्जी विभाग में वैज्ञानिक के रूप में काम किया। बाद में भारतीय वन सेवा में चयन होने के बाद उन्हें महाराष्ट्र कैडर मिला। वर्ष 2012 में वे अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए।
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