'कांग्रेस के समय बैंक बनते थे, अब बिकते हैं': IDBI बैंक की बिक्री पर राहुल गांधी ने सरकार से पूछे सवाल

HIGHLIGHTS
- पिछले साल मार्च में IDBI बैंक कर्मचारियों के प्रतिनिधिमंडल ने राहुल गांधी से मुलाकात की थी।
- बैंक ने पिछले साल 9,000 करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया।
- वर्ष 2003 में संसद में सरकार ने कम से कम 51% हिस्सेदारी बनाए रखने का आश्वासन दिया था।
सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों के निजीकरण को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों के नाम संदेश जारी कर बैंक को निजी हाथों में सौंपने के सरकार के फैसले का विरोध किया है। उन्होंने मुनाफे में चल रहे बैंक को कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स को बेचने के निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा कि सार्वजनिक धन से तैयार हुए बैंक बिक्री की वस्तु नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
राहुल गांधी ने सरकार के फैसले पर उठाए सवाल
आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों को भेजे गए संदेश में राहुल गांधी ने पिछले साल मार्च में हुई एक मुलाकात का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उस समय बैंक कर्मचारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने संसद भवन में उनसे मुलाकात की थी। प्रतिनिधिमंडल ने सवाल उठाया था कि कर्मचारियों की मेहनत से मुनाफे में आए बैंक को सरकार क्यों बेच रही है।
राहुल गांधी ने बताया कि उन्होंने यह मुद्दा लोकसभा में भी उठाया था। उन्होंने सरकार से पूछा था कि मुनाफे में चल रहे सरकारी बैंक को बेचने की जरूरत क्यों है और इस फैसले से कर्मचारियों तथा जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा किस तरह की जाएगी। हालांकि, उनके मुताबिक सरकार की ओर से इन सवालों का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया।
आईडीबीआई बैंक के मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, "कांग्रेस के समय में IDBI बना - देश का उद्योग खड़ा करने के लिए। मोदी के समय में पहले बोली देखी गई, फिर दाम तय हुआ। कांग्रेस के time पे बैंक बनते थे। मोदी के time में बिकते हैं। मैं IDBI बैंक के कर्मचारियों के साथ खड़ा हूं।"
सरकार ने आईडीबीआई बैंक को कनाडा की बहुराष्ट्रीय कंपनी फेयरफैक्स को बेचने का फैसला किया है। फिलहाल बैंक में केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की संयुक्त हिस्सेदारी 95 प्रतिशत है। बिक्री पूरी होने के बाद दोनों की कुल हिस्सेदारी घटकर 34 प्रतिशत रह जाएगी। इससे बैंक का नियंत्रण निजी हाथों में चला जाएगा।
घाटे से 9,000 करोड़ रुपये से अधिक के मुनाफे तक का सफर
आईडीबीआई बैंक के सफर का उल्लेख करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि इसकी शुरुआत एक अग्रणी विकास बैंक के तौर पर हुई थी। बाद में कई चुनौतियों से गुजरते हुए यह एक कमर्शियल बैंक बना।
बैंक की वित्तीय स्थिति में आए बदलाव पर उन्होंने कहा कि सात साल पहले तक आईडीबीआई बैंक घाटे में था। कर्मचारियों की मेहनत से बैंक ने वापसी की और पिछले साल 9,000 करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया।
2003 में संसद में दिया गया था 51 प्रतिशत हिस्सेदारी का आश्वासन
राहुल गांधी ने आईडीबीआई बैंक में सरकारी हिस्सेदारी को लेकर वर्ष 2003 में संसद में दिए गए आश्वासन का भी जिक्र किया। उस समय सरकार ने कहा था कि वह बैंक में अपनी हिस्सेदारी हमेशा कम से कम 51 प्रतिशत बनाए रखेगी।
उन्होंने कहा कि भले ही यह आश्वासन कानून में दर्ज नहीं है, लेकिन संसद में दिया गया वादा देश की जनता से किया गया वादा होता है।
निजीकरण से आरक्षण और कर्मचारियों के अधिकारों पर असर की आशंका
राहुल गांधी ने बैंक के निजीकरण से सामाजिक न्याय और कर्मचारियों के अधिकारों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर भी चिंता जताई।
उनके मुताबिक, बैंक के निजी स्वामित्व में जाने के बाद अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के उम्मीदवारों को मिलने वाला संवैधानिक आरक्षण समाप्त हो जाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि बैंक कर्मचारियों की सेवा शर्तें पहले ही कमजोर हुई हैं और निजीकरण के बाद वे अपनी आखिरी सुरक्षा भी खो सकते हैं।
कांग्रेस का रुख स्पष्ट करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देश के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कर्मचारियों की सभी जायज मांगों को समर्थन देने की बात कही और उनसे एकजुट तथा अडिग रहने का आह्वान किया।
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