नरेंद्र मोदी के सत्ता के शिखर पर 25 साल पूरे, गुजरात से दिल्ली तक ऐसा रहा सफर

HIGHLIGHTS
- नरेंद्र मोदी ने 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली थी।
- करीब 13 साल बाद उन्होंने देश के प्रधानमंत्री के रूप में पद संभाला।
- गुजरात में मोदी से पहले कई सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थीं।
भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेंद्र मोदी को आज सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए 25 साल पूरे हो गए हैं। इसके साथ ही वह लगातार इतने लंबे समय तक सरकार के शीर्ष पद पर रहने वाले देश के पहले नेता बन गए हैं। 7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी। करीब 13 साल बाद वह देश के प्रधानमंत्री बने। इस पूरे दौर में ऐसा एक भी दिन नहीं रहा, जब वह सत्ता के शिखर से बाहर रहे हों। किसी भी राजनेता के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
लंबे समय तक जनता के बीच अपनी पकड़ बनाए रखना आसान नहीं होता। सत्ता में बने रहने के साथ राजनेताओं के प्रति लोगों में नाराजगी भी पैदा होती है, लेकिन नरेंद्र मोदी इस मामले में अपवाद नजर आते हैं। उनकी लोकप्रियता के पीछे उनका व्यक्तित्व, जमीनी पकड़ या राजनीतिक कौशल है, यह राजनीति विज्ञानियों के लिए भी अहम सवाल रहा है।
1974 से गुजरात में राजनीतिक अस्थिरता
जब भाजपा संगठन के राष्ट्रीय महामंत्री पद से हटाकर नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया, तो यह फैसला सभी के लिए चौंकाने वाला था। उस समय गुजरात राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। शंकर सिंह बाघेला और केशू भाई पटेल भी राज्य को स्थिरता नहीं दे सके थे। इससे पहले कांग्रेस के कई मुख्यमंत्री भी गुजरात को संभाल नहीं पाए थे।
1974 में चिमन भाई पटेल के मुख्यमंत्री रहते गुजरात में बड़ा छात्र आंदोलन हुआ था। इसके बाद भी कोई मुख्यमंत्री राज्य में स्थायित्व कायम नहीं कर सका। चिमन भाई पटेल सिर्फ 207 दिन मुख्यमंत्री रहे और 9 फरवरी 1974 को गुजरात में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। उनके बाद कांग्रेस (ओ) के बाबू भाई पटेल मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनका कार्यकाल भी 268 दिनों तक ही रहा।
तीन बार मुख्यमंत्री बने माधव सिंह सोलंकी
इसके बाद गुजरात में 287 दिनों तक राष्ट्रपति शासन रहा। 24 दिसंबर 1976 को कांग्रेस (इंदिरा) के माधव सिंह सोलंकी मुख्यमंत्री बने। हालांकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया और 11 अप्रैल 1977 को बाबू भाई पटेल ने मुख्यमंत्री पद संभाला।
केंद्र में इंदिरा गांधी सरकार के वापस आने के बाद बाबू भाई पटेल की सरकार भी चली गई और राज्य में 111 दिनों तक राष्ट्रपति शासन रहा। छठी विधानसभा में कांग्रेस की बड़ी जीत के साथ माधव सिंह सोलंकी फिर मुख्यमंत्री बने। अगली विधानसभा में भी कांग्रेस सत्ता में लौटी और अमर सिंह मुख्यमंत्री बने।
करीब 4 साल 157 दिन बाद केंद्र की राजीव गांधी सरकार ने अमर सिंह को हटाकर माधव सिंह सोलंकी को फिर मुख्यमंत्री बनाया। वह 84 दिन तक मुख्यमंत्री रहे और इसके बाद विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो गया।
गुजरात में राष्ट्रपति शासन का दौर
आठवीं विधानसभा में जनता दल ने सरकार बनाई और चिमन भाई पटेल मुख्यमंत्री बने। हालांकि वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। उनकी सरकार तीन साल 350 दिनों के भीतर अल्पमत में आ गई। 17 फरवरी 1994 को कांग्रेस की ओर से छबील दास मेहता ने मुख्यमंत्री पद संभाला।
1995 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में आई और केशू भाई पटेल मुख्यमंत्री बने। वह सरकार में सिर्फ 221 दिन मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद भाजपा ने सुरेश मेहता पर भरोसा जताया और वह 334 दिनों तक मुख्यमंत्री रहे।
इसके बाद गुजरात एक बार फिर राष्ट्रपति शासन के दायरे में चला गया। 34 दिनों बाद राष्ट्रीय जनता पार्टी के शंकर सिंह वाघेला को मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि वह भी सरकार को स्थिर नहीं रख सके और एक वर्ष चार दिन बाद इसी पार्टी के दिलीप पारीख ने मुख्यमंत्री पद संभाला। उनका कार्यकाल भी 128 दिनों तक ही रहा।
केशूभाई पटेल के कार्यकाल में आया भूकंप
1998 में गुजरात विधानसभा के मध्यावधि चुनाव हुए। भाजपा की जीत के बाद 4 मार्च 1998 को केशूभाई पटेल ने मुख्यमंत्री पद संभाला। लेकिन 26 जनवरी 2001 को कच्छ में आए भूकंप ने गुजरात को बुरी तरह प्रभावित किया।
इसके बाद 7 अक्टूबर 2001 को केशूभाई पटेल की विदाई हुई और उसी दिन हरियाणा तथा हिमाचल में संगठन के प्रभारी नरेंद्र मोदी को गुजरात लाकर मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद से गुजरात और देश की राजनीति में नरेंद्र मोदी ने अपना कोई विकल्प बनने नहीं दिया।
इसके पीछे उनके राजनीतिक नेतृत्व, जमीनी समझ और गुजरात को वाइब्रेंट बनाने की क्षमता को अहम माना जाता है। नरेंद्र मोदी 7 अक्टूबर 2001 से 22 मई 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद 22 मई 2014 से वह देश के प्रधानमंत्री हैं। उनमें कमियां रही होंगी और हैं भी, लेकिन इन कमियों के बावजूद देश को गतिशील बनाए रखना उनकी बड़ी विशेषता बताई जाती है।
जाति और संप्रदाय की प्रयोगशाला बना था गुजरात
गुजरात नरेंद्र भाई मोदी के राजनीतिक जीवन में मील का पत्थर साबित हुआ। जिस गुजरात में चिमन भाई पटेल से लेकर केशूभाई पटेल तक कई तरह के राजनीतिक प्रयोग हुए, वहीं माधव सिंह सोलंकी से लेकर झीनाभाई दर्जी तक जातीय राजनीति के कई प्रयोग हुए।
माधव सिंह सोलंकी ने 1960 में बॉम्बे से अलग होकर बने गुजरात में KHAM पॉलिटिक्स की शुरुआत की। KHAM का मतलब क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और दलित वोटों के आधार पर जातीय समीकरण तैयार करना था।
इस राजनीति के कारण गुजरात में बनिया, पटेल और ब्राह्मण हाशिये पर चले गए। 1980 से शुरू हुई इस राजनीति का असर 1980 और 1985 के विधानसभा चुनाव में साफ दिखाई दिया। माधव सिंह सोलंकी तीन बार मुख्यमंत्री रहे और नरसिंह राव सरकार में विदेश मंत्री भी बने।
KHAM राजनीति के सूत्रधार थे झीनाभाई दर्जी
KHAM पॉलिटिक्स के प्रमुख सूत्रधार झीनाभाई दर्जी थे। वह प्रमुख गांधीवादी नेता थे और अछूतोद्धार के काम में सक्रिय रूप से जुटे थे। गुजरात में कांग्रेस की मजबूती के प्रमुख स्तंभों में उनका नाम भी लिया जाता था। KHAM राजनीति को लागू करने के लिए उन्होंने ही माधव सिंह सोलंकी को प्रेरित किया।
गुजरात बनने से पहले यहां सौराष्ट्र राज्य था। गुजरात बॉम्बे यानी बंबई प्रांत का हिस्सा था। भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की मांग बढ़ने के बाद 1 जून 1960 को गुजरात और सौराष्ट्र को मिला दिया गया। सौराष्ट्र की राजधानी राजकोट थी।
गुजरात का क्षेत्र काफी समृद्ध था। बॉम्बे-वडोदरा रूट पर स्थित यह इलाका उद्योग, कृषि और व्यापार के लिहाज से मजबूत था। शुरुआत में अहमदाबाद को राजधानी बनाया गया, लेकिन 1965 में अहमदाबाद से 40 किलोमीटर दूर गांधीनगर बसाया गया, जिसे बाद में राजधानी बना दिया गया।
व्यापार पर पटेल लॉबी का दबदबा
गुजरात में पटेल लॉबी के साथ बनिया भी व्यापार में काफी आगे थे। ब्राह्मणों की मौजूदगी नौकरशाही में थी, जबकि काठियावाड़ यानी सौराष्ट्र के हरिजन और गिरिजन सहित कई वर्ग गरीब और पिछड़े थे।
झीनाभाई दर्जी की सलाह पर माधव सिंह सोलंकी और अमर सिंह जैसे क्षत्रिय नेताओं ने KHAM की स्थापना की। इस राजनीतिक बदलाव के बाद गुजरात में जातीय और सांप्रदायिक दंगे भी होने लगे।
अहमदाबाद की फैक्ट्रियां बंद होने लगीं। सूरत का साड़ी उद्योग और हीरा साफ करने का काम भी प्रभावित हुआ। प्रशासनिक भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया। ऐसे गुजरात को एक मजबूत राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत थी, जो नरेंद्र भाई मोदी ने दिया।
हालांकि नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के अगले ही साल गुजरात में भीषण दंगा हुआ। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा मुसलमानों को झेलना पड़ा। पहले साबरमती एक्सप्रेस में आगजनी हुई और इसके बाद नरसंहार की घटनाएं सामने आईं।
गोधरा के बाद गुजरात में हिंसा
गुजरात के गोधरा में 27 जनवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आगजनी के बाद पूरे राज्य में हिंसा, मारपीट और आगजनी शुरू हो गई। उस समय नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बने सिर्फ चार महीने हुए थे।
साबरमती एक्सप्रेस से हिंदू तीर्थयात्री अयोध्या से लौट रहे थे। ट्रेन के एक कोच में आग लगने से 58 तीर्थयात्रियों की मौत हो गई। गोधरा मुस्लिम बहुल क्षेत्र है, इसलिए हिंदुओं ने इस घटना के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराया और मार्च में हिंदू-मुस्लिम दंगे शुरू हो गए।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन दंगों में 790 मुस्लिम और 294 हिंदू मारे गए। राज्य सरकार हिंसा को तुरंत रोक नहीं पाई। इसके बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में विकास और उद्यमशीलता पर जोर देना शुरू किया। इसका फायदा यह हुआ कि राज्य में हर साल होने वाली सांप्रदायिक और जातीय हिंसा पर रोक लगी। यही उद्यमशीलता आगे चलकर वाइब्रेंट गुजरात के रूप में सामने आई।
देश की राजनीति में भी मिला स्थिर नेतृत्व
गुजरात में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का असर देश की राजनीति पर भी पड़ा। जनता को लगा कि देश को स्थायी नेतृत्व देने में सक्षम प्रधानमंत्री की जरूरत है। इसी वजह से 2013 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र भाई मोदी को भाजपा ने अगले लोकसभा चुनाव के लिए अपना पोस्टर बॉय घोषित किया।
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला और 22 मई 2014 को नरेंद्र भाई मोदी देश के प्रधानमंत्री बने।
इसके बाद 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव भी भाजपा ने नरेंद्र मोदी के चेहरे पर जीते। इस तरह नरेंद्र मोदी लगातार तीन बार प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक और रणनीतिक कौशल के जरिए दुनिया भर में भारत को नए रूप में स्थापित किया।
इस दौरान भारत की अर्थव्यवस्था एक समय दुनिया में चौथे नंबर पर पहुंची थी, हालांकि फिलहाल वह छठे स्थान पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगातार 25 वर्ष तक सत्ता के शिखर पर रहने की बधाई।
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