संजय राउत ने विजय माल्या का किया बचाव, बोले- वह धोखेबाज नहीं थे

HIGHLIGHTS
- संजय राउत की नई किताब का नाम ‘बोध कीर्तन’ है।
- किताब में विजय माल्या से जुड़ा एक अलग अध्याय शामिल किया गया है।
- राउत ने माल्या के भारत छोड़ने की वजह को कारोबारी नाकामी बताया है।
शिवसेना (UBT) के नेता और सांसद संजय राउत अपनी नई किताब ‘बोध कीर्तन’ को लेकर चर्चा में हैं। इस किताब में उन्होंने कुछ ऐसे विचार साझा किए हैं, जो राजनीतिक और कारोबारी हलकों में बहस का विषय बन सकते हैं। राउत ने किताब में भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किए जा चुके विजय माल्या का बचाव किया है। उन्होंने माल्या को धोखेबाज मानने से इनकार करते हुए कहा कि उनका कारोबार डूब गया था और कर्ज चुकाने में असमर्थ होने के बाद वह भारत छोड़कर चले गए।
वहीं, इस किताब में संजय राउत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गैर-राजनीतिक भाषणों की सराहना भी की है। उन्होंने अयोध्या में आयोजित दीपोत्सव के दौरान प्रधानमंत्री के संबोधन को खास बताते हुए उसकी तारीफ की है।
विजय माल्या को लेकर संजय राउत ने किताब में क्या लिखा?
संजय राउत ने अपनी किताब के एक अध्याय ‘माल्या ची गोष्ट’ यानी माल्या की कहानी में विजय माल्या से जुड़े अपने अनुभवों का जिक्र किया है। उन्होंने दावा किया है कि माल्या कभी धोखेबाज नहीं थे।
राउत के मुताबिक, संसद में विजय माल्या उनके आसपास बैठते थे और सेंट्रल हॉल में भी दोनों के बीच बातचीत होती थी। इन मुलाकातों के आधार पर उन्होंने माल्या को मिलनसार, हंसमुख और आकर्षक व्यक्तित्व वाला बताया है।
राउत ने किताब में लिखा है कि माल्या की आलीशान जीवनशैली उनके कारोबारी कामकाज का हिस्सा थी और इसे उनकी गलती नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि माल्या में संसद के कई लोगों से अधिक देशभक्ति की भावना थी। राउत ने उन्हें खुले विचारों वाला और उदार व्यक्ति बताते हुए कहा कि उनका किसी को धोखा देने का इरादा नहीं था। ये सभी बातें राउत के निजी अनुभवों और उनके विचारों पर आधारित हैं।
क्या विजय माल्या को भगोड़ा मानने पर भी राउत ने उठाए सवाल?
अपनी किताब में संजय राउत ने विजय माल्या को भगोड़ा कहे जाने पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि माल्या का कारोबार मुश्किल में आ गया था और कर्ज चुकाने में असमर्थ होने के बाद उन्हें भारत छोड़ना पड़ा।
राउत ने इस पूरे मामले को धोखाधड़ी के बजाय कारोबारी असफलता के नजरिए से पेश किया है। उन्होंने लिखा है कि जब माल्या का कारोबार संकट में था, तब बैंकों को उनकी मदद करनी चाहिए थी, न कि उन्हें देश छोड़ने की स्थिति में पहुंचाना चाहिए था।
राउत के अनुसार, माल्या ने कर्ज माफ करने की मांग नहीं की थी, बल्कि कुछ समय की राहत मांगी थी। उन्होंने किताब में यह भी सवाल उठाया है कि पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने कई उद्योगपतियों को कर्ज के मामले में राहत दी, तो माल्या को भी अस्थायी छूट दी जा सकती थी।
हालांकि, यह संजय राउत का अपना पक्ष है। विजय माल्या भारत छोड़ने के बाद से ब्रिटेन में रह रहे हैं। वर्ष 2019 में उन्हें भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया गया था। भारत में उनके खिलाफ कथित कर्ज चूक और धनशोधन से जुड़े मामलों में प्रत्यर्पण की मांग की गई है।
प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों की भी की तारीफ
संजय राउत ने किताब के एक अन्य अध्याय ‘दीपस्तंभ’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों पर भी अपने विचार रखे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री के राजनीतिक और गैर-राजनीतिक भाषणों के बीच अंतर बताया है।
राउत का कहना है कि मोदी के राजनीतिक भाषणों में कई बार प्रभाव और गहराई की कमी नजर आती है, लेकिन उनके गैर-राजनीतिक संबोधन सुनने और पढ़ने में अच्छे लगते हैं।
उन्होंने विशेष रूप से अयोध्या में दीपोत्सव के दौरान प्रधानमंत्री के भाषण का उल्लेख किया है। राउत के मुताबिक, इस संबोधन में मोदी ने भगवान राम के आदर्शों को जिस तरह सामने रखा, वह भावनात्मक और प्रभावशाली था। उन्होंने इसे शब्दों के जरिए रोशनी का त्योहार बताने जैसा बताया है।
राउत ने लिखा है कि प्रधानमंत्री ने भगवान राम के आदर्शों को सभी भारतीयों के लिए मार्गदर्शक प्रकाश के रूप में प्रस्तुत किया।
कब होगा ‘बोध कीर्तन’ का लोकार्पण?
संजय राउत की नई किताब ‘बोध कीर्तन’ का लोकार्पण शनिवार को किया जाएगा। इस कार्यक्रम में ठाकरे बंधुओं के भी मौजूद रहने की बात कही गई है।
इस किताब में राउत ने अपने निजी अनुभवों, मुलाकातों और पढ़ी गई चीजों के आधार पर कई प्रमुख हस्तियों के बारे में अपने विचार साझा किए हैं। इसमें राजनीति और कारोबार जगत की जानी-मानी हस्तियों से जुड़े उनके अनुभव शामिल हैं।
विजय माल्या पर लिखे अध्याय में राउत ने उनके व्यक्तित्व और संसद में हुई मुलाकातों का जिक्र किया है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लिखे अध्याय में उनके भाषणों का विश्लेषण किया गया है।
किताब के ये दोनों अध्याय खास चर्चा में हैं। इसकी वजह है कि एक तरफ संजय राउत ने विजय माल्या के पक्ष में अपनी राय रखी है, तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी के गैर-राजनीतिक भाषणों की खुलकर सराहना की है।
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