सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की अंतिम अपील, बोफोर्स मामले का कानूनी अध्याय खत्म

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता अजय के. अग्रवाल की अंतिम याचिका को खारिज कर दिया।
- सीबीआई की अपील पहले ही 2018 में देरी के आधार पर खारिज हो चुकी थी।
- बोफोर्स सौदा 1986 में भारत सरकार और एबी बोफोर्स के बीच हुआ था।
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुजा ब्रदर्स को बरी करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के फैसले के खिलाफ दायर अंतिम अपील को भी खारिज कर दिया है। इसके साथ ही देश के सबसे चर्चित और लंबे समय तक चले बोफोर्स मामले का कानूनी अध्याय समाप्त हो गया है।
सर्वोच्च अदालत ने अंतिम याचिका की खारिज
इस मामले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की पीठ ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता अजय के. अग्रवाल की स्थगन की मांग को स्वीकार नहीं किया और अंतिम याचिका को खारिज कर दिया।
इससे पहले केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने भी इस मामले में अपील दायर की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। साल 1986 में हुए इस रक्षा सौदे से जुड़ा विवाद करीब चार दशक तक अदालतों और भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय बना रहा।
क्या है बोफोर्स मामला?
यह मामला 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुए 1,437 करोड़ रुपये के समझौते से जुड़ा है। इस सौदे के तहत भारतीय सेना के लिए 400 हॉवित्जर तोपों की खरीद की जानी थी।
साल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने खुलासा किया था कि इस रक्षा सौदे को हासिल करने के लिए भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को कथित रूप से अवैध कमीशन दिया गया। इस खुलासे के बाद भारतीय राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। राजीव गांधी सरकार पर सवाल उठे और 1989 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की हार के पीछे इसे एक अहम मुद्दा माना गया।
सीबीआई ने दर्ज की थी एफआईआर
सीबीआई ने जनवरी 1990 में इस मामले में एफआईआर दर्ज की थी। इसमें बोफोर्स कंपनी के तत्कालीन अध्यक्ष मार्टिन आर्डबो और कथित बिचौलिए विन चड्ढा समेत कई लोगों को आरोपी बनाया गया था।
बाद में जांच का दायरा बढ़ा और इतालवी कारोबारी ओटावियो क्वात्रोच्ची का नाम भी सामने आया। अक्टूबर 2000 में दाखिल सप्लीमेंट्री चार्जशीट में हिंदुजा बंधुओं श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा को भी आरोपी बनाया गया था।
2005 में दिल्ली हाईकोर्ट ने रद्द की थी कार्रवाई
दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 मई 2005 को अपने फैसले में हिंदुजा ब्रदर्स और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया था।
हाईकोर्ट ने इस दौरान सीबीआई की जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए थे। अदालत ने कहा था कि इस जांच में सरकारी खजाने के करीब 250 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने जताई थी नाराजगी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मामले के इतने लंबे समय तक लंबित रहने पर हैरानी जताई। जब याचिकाकर्ता के वकील ने कुछ मृत प्रतिवादियों के नाम हटाने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा, तो जस्टिस पारदीवाला ने इस पर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा, "हिंदुजा ब्रदर्स और सीबीआई को लेकर यह सब क्या चल रहा है? सभी कार्यवाही रद्द हो चुकी हैं, यह क्या है? कितने साल बीत चुके हैं?"
वकील की ओर से यह बताए जाने पर कि यह सौदा 1986 का है, पीठ ने स्पष्ट किया कि अब मामले में और देरी या सुनवाई की कोई संभावना नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही बोफोर्स पे-ऑफ मामले से जुड़ी सभी कानूनी प्रक्रियाएं अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई हैं।
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