सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी क्रीमी लेयर निर्धारण में सैलरी को अकेला आधार बनाने पर लगाई रोक

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के क्रीमी लेयर से जुड़े विवाद में अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं। दो जजों की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता या अभिभावकों की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार की अपील को खारिज कर दिया और कहा कि उम्मीदवारों के माता-पिता या अभिभावकों के पद और स्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
UPSC उम्मीदवारों को मिली राहत
अदालत ने उन यूपीएससी उम्मीदवारों को बड़ी राहत दी, जिन्हें सिविल सेवा परीक्षा पास होने के बावजूद नौकरी नहीं दी गई थी। सरकार ने उनके माता-पिता की सैलरी को आधार मानकर उन्हें गलत तरीके से क्रीमी लेयर में शामिल कर आरक्षण से बाहर किया था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अधिकारियों ने गलत पैमाने का इस्तेमाल किया। जस्टिस महादेवन ने लिखा कि उम्मीदवार क्रीमी लेयर में आते हैं या नहीं, यह निर्णय केवल आय पर आधारित नहीं हो सकता।
सरकारी और पीएसयू कर्मचारियों में भेदभाव को ठुकराया
यह विवाद उन उम्मीदवारों से जुड़ा था जिनके माता-पिता सार्वजनिक उपक्रम (PSU), बैंक या अन्य संस्थानों में कार्यरत थे। सरकार ने 2004 के एक स्पष्टीकरण पत्र का हवाला देते हुए उनकी सैलरी को आय में जोड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2004 का पत्र मुख्य नीति को बदल नहीं सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को पद के आधार पर छूट मिलने और पीएसयू कर्मचारियों के बच्चों को केवल सैलरी के आधार पर बाहर करना समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
अगले छह महीने में कार्रवाई जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि छह महीने के भीतर इन उम्मीदवारों के दावों पर पुनर्विचार किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि आवश्यक होने पर इन उम्मीदवारों को नौकरी देने के लिए अलग पद बनाए जाएं। अदालत ने 1993 के सरकारी आदेश का हवाला दिया, जो इंदिरा साहनी मामले के बाद लागू हुआ था। इसमें साफ किया गया कि क्रीमी लेयर तय करने के लिए माता-पिता का पद मुख्य आधार है और सैलरी या कृषि से होने वाली कमाई को आय परीक्षण में शामिल नहीं किया जाता।
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