पटना के गांधी मैदान में रावण दहन की शुरुआत की कहानी, 300 रुपये से लाखों तक पहुंचा बजट

HIGHLIGHTS
- श्री दशहरा कमेटी ट्रस्ट का गठन वर्ष 1954 में किया गया था।
- पहले आयोजन में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले क्रमशः 40, 30 और 20 फीट ऊंचे थे।
- वर्ष 1962, 1965 और 1971 में युद्धों के दौरान रावण दहन नहीं हुआ।
पटना। गांधी मैदान में हर साल होने वाला रावण दहन आज पटना की पहचान बन चुका है। इस आयोजन को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं और इसकी भव्यता शहर के प्रमुख सार्वजनिक आयोजनों में शामिल है। हालांकि, इस परंपरा की शुरुआत महज 300 रुपये के चंदे से हुई थी।
देश विभाजन के बाद पटना आए पंजाबी समुदाय के कुछ लोगों ने वर्ष 1954 में श्री दशहरा कमेटी ट्रस्ट का गठन किया और इस आयोजन की नींव रखी। इसके अगले साल, 1955 में गांधी मैदान में पहली बार रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया गया। लाहौर के पास गुजरेवाला गांव से पटना आए बख्शी राम गांधी ने अपने भाइयों और सहयोगियों के साथ इसकी शुरुआत की थी।
सीमित संसाधनों से शुरू हुआ यह आयोजन धीरे-धीरे शहर की प्रमुख परंपराओं में शामिल हो गया। आज इस पर 30 से 35 लाख रुपये तक खर्च किए जाते हैं। यह परंपरा केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि सामुदायिक सहयोग, सांस्कृतिक पहचान और संकट के समय सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की मिसाल भी रही है।
40 फीट ऊंचे रावण के पुतले से हुई थी शुरुआत
दशहरा कमेटी ट्रस्ट के अध्यक्ष अरुण कुमार के अनुसार, वर्ष 1955 में गांधी मैदान में आयोजित पहले कार्यक्रम में रावण का पुतला 40 फीट, कुंभकर्ण का 30 फीट और मेघनाद का 20 फीट ऊंचा बनाया गया था।
इन पुतलों को गया के एक मुस्लिम कारीगर ने तैयार किया था। आयोजन के लिए शहर के लोगों से चंदा इकट्ठा किया गया। आरके मल्होत्रा, पीके कोचर, पीआर मेहता, दुर्गा प्रसाद शर्मा, प्रेमनाथ अरोड़ा, ओपी बिहारी और संतोष चंद्रा समेत कई लोगों ने आर्थिक सहयोग दिया।
संसाधन कम होने के बावजूद आयोजन को लेकर लोगों में खासा उत्साह था। पुतला दहन देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग गांधी मैदान पहुंचे थे। विजयादशमी के दिन पाल होटल से राम, लक्ष्मण और वानर सेना की झांकी ट्रैक्टर पर निकाली जाती थी। नगर भ्रमण के बाद यह झांकी गांधी मैदान पहुंचती थी। रास्ते में भी लोग इसे देखने के लिए जुटते थे।
युद्ध और बाढ़ के दौरान स्थगित हुआ रावण दहन
गांधी मैदान में रावण दहन की परंपरा के दौरान ऐसे मौके भी आए, जब राष्ट्रीय संकट और प्राकृतिक आपदा के कारण आयोजन नहीं किया गया। अरुण कुमार के मुताबिक, वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय कार्यक्रम स्थगित कर चंदे से जुटाई गई राशि राहत कोष में दे दी गई थी।
वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान भी रावण दहन नहीं हुआ। इसके अलावा, वर्ष 1975 में पटना में आई बाढ़ के कारण आयोजन स्थगित करना पड़ा। उस समय कमेटी ने बाढ़ प्रभावित लोगों की मदद के लिए राशि जुटाई।
कोरोना काल में भी इस परंपरा का स्वरूप बदल गया था। उस दौरान वृंदावन में पांच सदस्यों ने सीमित स्तर पर रावण दहन किया। वहीं, वर्ष 2022 में पटना के कालिदास रंगालय में छोटे पुतले के साथ कार्यक्रम आयोजित किया गया।
1990 के बाद आयोजन को मिली व्यापक पहचान
वर्ष 1990 के बाद गांधी मैदान के दशहरा आयोजन की पहचान और व्यापक हुई। तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद पहली बार मुख्य अतिथि के रूप में रावण दहन कार्यक्रम में शामिल हुए। इसके बाद मुख्यमंत्री, राज्यपाल और अन्य प्रमुख हस्तियों की मौजूदगी भी इस आयोजन का हिस्सा बनने लगी।
समय के साथ कार्यक्रम की लोकप्रियता बढ़ती गई और दर्शकों की संख्या में भी इजाफा हुआ। इस तरह गांधी मैदान का रावण दहन पटना के प्रमुख सार्वजनिक आयोजनों में अपनी जगह बनाने लगा।
बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन ने उठाया खर्च का जिम्मा
शुरुआती वर्षों में आयोजन के लिए पैसे जुटाना कमेटी के सामने बड़ी चुनौती थी। बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन के तत्कालीन मालिक दुर्गा प्रसाद शर्मा के नेतृत्व में कमेटी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। आयोजन के खर्च में बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन का प्रमुख योगदान रहता था, जबकि कमेटी के अन्य सदस्य भी आर्थिक सहायता देते थे।
उस समय शहर में आइसक्रीम फैक्ट्री के नाम से एक कोल्ड स्टोरेज था, जहां किसान अपनी फसल रखने आते थे। आयोजन के लिए वहां भी चंदा इकट्ठा किया जाता था। लोगों के छोटे-छोटे योगदान से शुरू हुई यह परंपरा आज लाखों रुपये के बजट तक पहुंच चुकी है।
मिलर हाई स्कूल से नागाबाबा ठाकुरबाड़ी तक पहुंची रामलीला
पटना के दशहरा उत्सव में रावण दहन के साथ रामलीला और भरत मिलाप का भी अहम स्थान है। दशहरा कमेटी ने वर्ष 1984 में पहली बार मिलर हाई स्कूल मैदान में रामलीला का आयोजन किया था। इसमें दूसरे स्थानों से आए कलाकार नौ दिनों तक रामकथा का मंचन करते थे।
बाद में रामलीला का आयोजन कदमकुआं स्थित नागाबाबा ठाकुरबाड़ी में होने लगा। यहां वृंदावन के कलाकार रामकथा के विभिन्न प्रसंगों का मंचन करते हैं।
रावण दहन के अगले दिन नागाबाबा अखाड़ा से भरत मिलाप की झांकी गांधी मैदान पहुंचती है। इस दौरान श्रद्धालु श्रीराम के स्वागत में फूल बरसाते हैं। रथ पर विराजमान श्रीराम के अभिनंदन के लिए सड़क के दोनों ओर लोगों की भीड़ जुटती है।
300 रुपये के चंदे से लाखों के बजट तक पहुंचा आयोजन
गांधी मैदान में रावण दहन का इतिहास सिर्फ पुतलों की ऊंचाई और आयोजन के बढ़ते बजट की कहानी नहीं है। यह विभाजन के बाद पटना आए लोगों की अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने की कोशिश और शहरवासियों के सामूहिक सहयोग का भी उदाहरण है।
युद्ध और बाढ़ के समय आयोजन रोककर राहत कार्यों को प्राथमिकता देना और कठिन परिस्थितियों में इस परंपरा को नए स्वरूप में जारी रखना इसकी यात्रा का हिस्सा रहा है।
छह दशक से अधिक समय में पुतलों का आकार बढ़ा, बजट लाखों रुपये तक पहुंचा और दर्शकों की संख्या में इजाफा हुआ। इसके बावजूद इस आयोजन की बुनियाद आज भी सामुदायिक सहयोग और सामाजिक सहभागिता पर टिकी हुई है।
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