गंगा एक्सप्रेसवे- प्रगति और किसान हित !

29 अप्रैल, 2026 को हरदोई जिले के मल्लावां कस्बे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मेरठ-प्रयागराज ग्रीन फील्ड एक्सप्रेसवे का लोकार्पण किया। 594 किलोमीटर लम्बे मार्ग और उस पर पुलों, फ्लाईओवर, जंक्शन, अंडरपास बनाने पर 36230 करोड़ रुपये की लागत आई है। प्रयागराज जाने के लिए जहां पहले 11-12 घंटे लगते थे, अब सिर्फ 6-7 घंटे ही लगेंगे। राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्विट्जरलैंड की भांति सुविधाओं को विकसित किया गया है। मार्ग पर जन सुविधाएं (शौचालय आदि) बच्चों के लिए पार्क झूले, वाहन पार्क, होटल मोटल, चालकों के लिए पृथक, प्रावासी व्यवस्था, दुर्घटना होने पर ट्रामा सेंटर का प्रावधान, हर किलोमीटर पर एआई कैमरे, तथा 7 सेंसर सेंटर, चौबीसों घंटे एम्बुलेंस की उपलब्धता, 24 घंटे मार्ग पर पेट्रोलिंग, गाड़ियों के लिए पेट्रोल-डीजल पम्प, बैटरी चार्जिंग की व्यवस्था है। राष्ट्रीय राजमार्ग 12 जिलों से होकर गुजरेगा जो अन्य राजमार्गों तथा उत्तर प्रदेश को दूसरे राज्यों से भी जोड़ेगा। राष्ट्रीय राजमार्ग पर 7 बड़े पुल, 15 छोटे पुल, 126 रेलवे ओवर ब्रिज, 18 फ्लाईओवर, 282 अंडरपास बने हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने लोकार्पण के पश्चात सभा में कहा कि जिस प्रकार मां गंगा सहस्रों वर्षों से भारत की जीवन रेखा बनी हुई है, वैसे ही गंगा एक्सप्रेसवे भी विकास की नयी जीवन रेखा बनेगी। प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि इस एक्सप्रेसवे का मेरठ से हरिद्वार तक का विस्तार किया जाएगा।
लोकार्पण के अवसर पर उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गंगा एक्सप्रेसवे के निर्माण में किसानों के योगदान की मुक्तकंठ से सराहना की। उन्होंने कहा कि मार्ग निर्माण हेतु भूमि देकर किसानों ने प्रदेश की प्रगति एवं विकास में हाथ बटाया, जिसके लिए हम कृतज्ञ हैं। मुख्यमंत्री श्री योगी ने बताया कि एक लाख किसानों ने एक्सप्रेसवे के लिए अपनी 18 हजार एकड़ जमीन दी है। 7000 एकड़ जमीन लॉजिस्टिक पार्कों के लिए दी गई। मुख्यमंत्री ने कहा कि युवकों के लिए रोजगार उपलब्ध होंगे, औद्योगिक प्रगति होगी, किसानों को बड़े बाजार उपलब्ध होंगे।
नये मार्गों, पुलों, औद्योगिक स्थानों, हवाई अड्डों आदि के लिए खेती की जमीन अधिग्रहित की जाती है। सीधे तौर पर इस प्रगति या विकास का लाभ गैर-किसानों को पहुंचता है। नोएडा का उदाहरण सामने है। वहां पहले 2 रूपये गज मुआवजा निर्धारित किया गया। रामबीर बिधूड़ी ने सालों साल संघर्ष किया तो अदालत ने 20 रुपये गज का मुआवजा तय किया। अधिकांश किसानों ने मुआवजे का पैसा गैर कृषि कार्यों में या गुलछर्रे उड़ाने में जाया कर दिया। आज नोएडा रियल एस्टेट कंपनी चलाने वालों का स्वर्ग बना हुआ है।
विकास आज अनिवार्यता है। देश को मध्य काल के अंधे युग में नहीं लौटाया जा सकता। प्रगति के लिए सड़कें, कारखाने, विश्वविद्यालय, हवाई अड्डों, मंडियों, आई.टी.आई, एम्स, जैसे मेडिकल कॉलेजों आदि की जरूरत और बढ़ेगी। इन सबके लिए भूमि की जरूरत पड़ती है। भूमि अधिग्रहण कर किसान का आभार प्रकट करने से बात कैसे बनेगी? जो किसान पीढ़ी दर पीढ़ी परम्परागत रूप से खेती करते आए हैं, अपनी जमीन अधिग्रहित होने के बाद क्या करेंगे, कहां जायेंगे। मुआवजे के पैसे का सद्उपयोग हर किसान के बूते से बाहर है।
विकास की परियोजनाओं और भूमि अधिग्रहण से पूर्व केन्द्र सरकार को किसान के वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था का नक्शा भी तैयार करना चाहिए। मुआवजे की धनराशि के सही उपयोग के लिए किसान को मानसिक रूप से तैयार किया जाना चाहिए और इसमें मदद की जानी चाहिये। प्रगति के साथ साथ सरकार यह भी सोचे कि जमीन देने के बाद किसान उजड़ न जाए।
गोविंद वर्मा
संपादक 'देहात'
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