भारत का दो टूक संदेश: पुराने स्वरूप में फिर लागू नहीं होगी सिंधु जल संधि

HIGHLIGHTS
- भारत सरकार ने साफ किया कि सिंधु जल संधि अपने मौजूदा स्वरूप में दोबारा लागू नहीं होगी, भविष्य में बदलाव के लिए नए ढांचे पर बातचीत संभव है।
- भारत ने कहा कि संधि से जुड़े किसी भी फैसले में पाकिस्तान का आतंकवाद के खिलाफ कदम उठाना अहम शर्त होगी। फिलहाल पाकिस्तान की ओर से कोई ठोस प्रयास नहीं दिखे हैं।
- सिंधु जल संधि को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच किशनगंगा और रतले परियोजनाओं सहित कई मुद्दों पर लंबे समय से विवाद चल रहा है।
सरकारी सूत्रों ने सोमवार को कहा कि सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) अब अपने पुराने स्वरूप में दोबारा लागू नहीं की जाएगी। सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान ने अभी तक भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद को रोकने की दिशा में कोई संकेत नहीं दिया है, जबकि संधि के तहत सहयोग बहाल करने के लिए यह पहली शर्त है।
सूत्रों ने बताया कि यदि भविष्य में संधि से जुड़े प्रावधानों को फिर से लागू करने पर विचार किया जाता है तो इसके लिए नए स्वरूप में बातचीत करनी होगी। यह तभी संभव होगा, जब पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकवाद को स्थायी रूप से समर्थन देना बंद करेगा।
क्या भारत सिंधु जल संधि खत्म करेगा?
सरकारी सूत्रों ने कहा कि पाकिस्तान यह धारणा बनाने की कोशिश कर रहा है कि भारत द्वारा संधि को स्थगित किए जाने से वहां पानी की कमी हो रही है। हालांकि, उनका कहना है कि पाकिस्तान को मिलने वाले पानी का बड़ा हिस्सा पर्याप्त भंडारण व्यवस्था न होने, भारी रिसाव और प्रांतों के बीच जल बंटवारे से जुड़े विवादों के कारण बर्बाद हो जाता है।
सूत्रों के अनुसार, भारत फिलहाल सिंधु जल संधि से अलग होने पर सक्रिय रूप से विचार नहीं कर रहा है, लेकिन एक संप्रभु देश के रूप में उसके पास अपने हितों के खिलाफ जाने वाली किसी भी संधि को समाप्त करने का अधिकार सुरक्षित है। एक सूत्र ने कहा कि संधि से बाहर निकलने का फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि भविष्य में पाकिस्तान किस तरह के कदम उठाता है।
नए ढांचे में हो सकती है जल संधि
पिछले साल अप्रैल में पहलगाम आतंकी हमले में 26 नागरिकों की मौत के बाद भारत ने कई कूटनीतिक और आर्थिक कदम उठाए थे। इन्हीं कदमों के तहत सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला लिया गया था। भारतीय अधिकारियों के अनुसार, इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा के सहयोगी संगठन 'द रेजिस्टेंस फ्रंट' (टीआरएफ) ने ली थी।
इसके बाद भारत ने मई में 'ऑपरेशन सिंदूर' के जरिए पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ढांचों को निशाना बनाया था। एक सूत्र ने कहा कि सिंधु जल संधि अगर दोबारा लागू होती है तो वह पुराने स्वरूप में नहीं, बल्कि नए ढांचे के तहत होगी और इसके लिए पाकिस्तान को आतंकवाद से दूरी बनानी होगी।
पाकिस्तान की बयानबाजी पर भारत की नजर
सूत्रों ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की ओर से भारत के खिलाफ बयानबाजी बढ़ी है। इनमें परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी से लेकर सिंधु जल संधि स्थगित होने के बाद सीमा पार बहने वाले पानी को रोकने की स्थिति में युद्ध जैसी चेतावनियां भी शामिल हैं।
क्या है सिंधु जल संधि?
विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई सिंधु जल संधि के तहत भारत को रावी, ब्यास और सतलुज नदियों पर अधिकार प्राप्त है, जबकि पाकिस्तान के हिस्से में सिंधु, झेलम और चिनाब नदियां आती हैं। इस संधि के तहत दोनों देशों को एक-दूसरे की नदियों के सीमित उपयोग का अधिकार दिया गया है।
इसके अलावा भारत को पश्चिमी नदियों पर पाकिस्तान में प्रवेश से पहले किशनगंगा और रतले जैसी रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं बनाने की अनुमति भी है।
भारत और पाकिस्तान ने 19 सितंबर 1960 को करीब नौ वर्षों की बातचीत के बाद सीमा पार बहने वाली नदियों के प्रबंधन के लिए इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे। संधि को स्थगित करने से पहले भारत ने विभिन्न विवादों को लेकर पाकिस्तान के रवैये का हवाला देते हुए इसमें संशोधन की मांग भी उठाई थी।
भारत का कहना रहा है कि विवादों के समाधान के लिए संधि में तय प्रक्रिया का पालन होना चाहिए और एक ही मुद्दे पर दो अलग-अलग प्रक्रियाएं एक साथ नहीं चल सकतीं।
किशनगंगा और रतले परियोजनाओं को लेकर विवाद
सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने 2015 में किशनगंगा और रतले परियोजनाओं से जुड़े विवादों के समाधान के लिए पहले तटस्थ विशेषज्ञ की नियुक्ति की मांग की थी। लेकिन 2016 में उसने अपना रुख बदलते हुए मध्यस्थता न्यायालय (कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन) की मांग कर दी।
इसी साल विश्व बैंक ने तटस्थ विशेषज्ञ और मध्यस्थता न्यायालय दोनों की नियुक्ति कर दी थी, जिसे भारत ने स्वीकार नहीं किया। भारत तटस्थ विशेषज्ञ की बैठकों में शामिल हुआ, लेकिन मध्यस्थता न्यायालय की प्रक्रिया से दूरी बनाए रखी।
सूत्रों का कहना है कि सिंधु जल संधि को दोबारा लागू करने का फैसला पूरी तरह पाकिस्तान के व्यवहार पर निर्भर करेगा, खासकर सीमा पार आतंकवाद रोकने के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर।
आतंकवाद के खिलाफ कदम नहीं उठा रहा पाकिस्तान
सूत्रों ने कहा कि भारत को ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है जिससे यह पता चले कि पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद खत्म करने के लिए प्रयास कर रहा है।
उन्होंने कहा कि इसके विपरीत ऐसी जानकारियां मिल रही हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 प्रतिबंध समिति द्वारा प्रतिबंधित व्यक्ति और संगठन पाकिस्तान में सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं और उन्हें अपने विचार रखने के लिए मंच भी मिल रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, नियंत्रण रेखा के पार आतंकवादी गतिविधियों को लेकर उपलब्ध जानकारी भी यही संकेत देती है कि उन्हें रोकने के लिए अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
भारत की परियोजनाओं में बाधा डालने का आरोप
सूत्रों ने कहा कि सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान का रवैया सहयोग करने के बजाय लगातार अड़चनें पैदा करने वाला रहा है। उनका कहना है कि संधि लागू होने के शुरुआती वर्षों से ही पाकिस्तान ने पश्चिमी नदियों पर भारत की लगभग हर परियोजना का विरोध किया है।
सूत्रों के मुताबिक, दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में बिजली पहुंचाने के लिए बनाई गई 200 किलोवाट की छोटी जलविद्युत परियोजना पर भी पाकिस्तान ने लंबे समय तक आपत्ति जताई थी। इसके अलावा सलाल, तुलबुल, बगलिहार, किशनगंगा, रतले और पाकल दुल जैसी बड़ी परियोजनाओं का भी विरोध किया गया।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने संधि के प्रावधानों का इस्तेमाल सहयोग के बजाय भारत की विकास परियोजनाओं में देरी कराने और उन्हें प्रभावित करने के लिए किया।
सूत्रों के अनुसार, विवाद समाधान की व्यवस्था, जिसे वास्तविक मतभेदों को सुलझाने के लिए बनाया गया था, धीरे-धीरे भारत की परियोजनाओं को लंबित रखने का माध्यम बन गई।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने तकनीकी मुद्दों को बार-बार तीसरे पक्ष के मंचों तक पहुंचाया, द्विपक्षीय बातचीत को लंबे समय तक खींचा और हाल के वर्षों में संधि की तय प्रक्रिया के विपरीत तटस्थ विशेषज्ञ और मध्यस्थता न्यायालय दोनों के समक्ष समानांतर कार्यवाही की मांग की।
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