साइबर ठगी मामले में MP हाईकोर्ट सख्त, जांच में देरी पर पुलिस और बैंकों को लगाई फटकार

HIGHLIGHTS
- जबलपुर के छह लाख रुपये की साइबर ठगी मामले में जांच में देरी पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई।
- कोर्ट ने पुलिस, बैंक और जांच एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की कमी पर चिंता जताते हुए RBI से सुरक्षा उपायों की जानकारी मांगी।
- हाईकोर्ट ने साइबर फ्रॉड की जांच के लिए केंद्रीकृत, तकनीक आधारित और समयबद्ध प्रोटोकॉल तैयार करने की जरूरत बताई।
जबलपुर। छह लाख रुपये की कथित साइबर ठगी के मामले में पुलिस और प्रशासन की धीमी कार्रवाई को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जांच में हो रही देरी पर कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे न केवल विवेचना प्रभावित होती है, बल्कि आरोपियों को ठगी की रकम को ठिकाने लगाने का मौका भी मिल जाता है।
हाईकोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से यह बताने को कहा है कि साइबर फ्रॉड की जांच के दौरान बैंकों की ओर से समय पर नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए कौन-कौन से नियामकीय सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं।
जांच में देरी और संस्थागत कमियों पर कोर्ट की चिंता
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी निश्चित रूप से एक अहम घटनाक्रम है, लेकिन इस मामले ने कई गंभीर संस्थागत कमियों को सामने ला दिया है।
कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग राज्यों की पुलिस, जांच एजेंसियों और बैंकिंग संस्थानों के बीच समन्वय की कमी दिखाई देती है। इसके अलावा राज्य और केंद्र सरकार की एजेंसियों के बीच भी तालमेल की कमी चिंताजनक है।
अदालत ने कहा कि साइबर धोखाधड़ी के मामलों में तत्काल, समन्वित और तकनीक आधारित कार्रवाई जरूरी है, जबकि मौजूदा मामला प्रक्रियात्मक देरी और संस्थागत असमन्वय को दर्शाता है।
बैंक साइबर धोखाधड़ी में पहली सुरक्षा दीवार: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने कहा कि साइबर वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में बैंक बचाव की पहली पंक्ति होते हैं। बैंकों की जिम्मेदारी है कि वे समय पर लेनदेन की जानकारी दें, संदिग्ध खातों को तुरंत फ्रीज करें, जांच एजेंसियों के साथ खातों से जुड़ी जानकारी तेजी से साझा करें और संदिग्ध लेनदेन की रिपोर्ट करें।
कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में बैंक जरूरी तत्परता नहीं दिखाते। धोखाधड़ी के बाद बीतने वाला हर घंटा पीड़ित की रकम वापस मिलने की संभावना को कम करता है।
साइबर अपराधियों को मिल रहा समन्वय की कमी का फायदा
एकलपीठ ने कहा कि आरोपी इसी समन्वय की कमी का फायदा उठाते हैं। तकनीक ने अपराधियों को राज्य की सीमाओं से बाहर आसानी से अपराध करने की क्षमता दी है, जबकि जांच एजेंसियां अभी भी प्रशासनिक सीमाओं में काम कर रही हैं।
अदालत ने कहा कि साइबर अपराध अब सिर्फ किसी एक राज्य का विषय नहीं रह गया है। इसके लिए राज्य पुलिस, केंद्रीय एजेंसियों, बैंकिंग संस्थानों, वित्तीय नियामकों और दूरसंचार विभाग के बीच बेहतर सहयोग जरूरी है।
'प्रीतम और पेड्रो' के साथ आने का समय: हाईकोर्ट
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अब 'प्रीतम और पेड्रो' के एक साथ आने का समय है। अदालत ने कहा कि साइबर अपराध की प्रभावी जांच तभी संभव है, जब तकनीकी विशेषज्ञता और पारंपरिक पुलिसिंग पूरी तत्परता और समन्वय के साथ काम करें।
हाईकोर्ट ने कहा कि साइबर अपराधी क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर काम करते हैं, जबकि जांच एजेंसियां अभी भी प्रशासनिक दायरों तक सीमित हैं। यह व्यवस्था न तो प्रभावी है और न ही लंबे समय तक टिकाऊ।
केंद्रीकृत प्रोटोकॉल तैयार करने की जरूरत
हाईकोर्ट ने कहा कि साइबर वित्तीय धोखाधड़ी की जांच के लिए एक केंद्रीकृत, तकनीक आधारित और समयबद्ध प्रोटोकॉल तैयार किया जाना चाहिए। इसके लिए राज्य सरकारों, केंद्र सरकार, बैंकिंग नियामकों, वित्तीय संस्थानों, दूरसंचार प्राधिकरणों और जांच एजेंसियों के बीच संयुक्त विचार-विमर्श जरूरी है।
एकलपीठ ने याचिकाकर्ता, प्रतिवादियों, न्याय मित्र और अधिवक्ताओं से इस संबंध में ठोस सुझाव देने को कहा है, ताकि साइबर अपराध के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए प्रभावी संस्थागत ढांचा तैयार किया जा सके।
मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई को निर्धारित की गई है। कोर्ट ने असम, पश्चिम बंगाल और झारखंड के पुलिस महानिदेशकों, संबंधित राज्यों के गृह सचिवों, केंद्र सरकार के गृह सचिव, दूरसंचार विभाग के केंद्रीय सचिव, जबलपुर पुलिस अधीक्षक और मामले से जुड़े जांच अधिकारियों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने के निर्देश दिए हैं।
अदालत ने यह भी चेतावनी दी है कि बिना उचित कारण आदेश का पालन नहीं करने को गंभीरता से लिया जाएगा और जरूरत पड़ने पर आवश्यक आदेश पारित किए जाएंगे।
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