अक्षत त्रिपाठी को नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर जताई नाराजगी

HIGHLIGHTS
- नोटिस 4 सितंबर 2026 को जारी किया गया था।
- पुलिस रिपोर्ट में छात्र पर सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैलाने का आरोप लगाया गया।
- सीजेपी के प्रस्तावित धरने में छात्रों को शामिल होने के लिए उकसाने की बात कही गई।
ग्रेटर नोएडा। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ग्रेटर नोएडा के एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई। मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के दूसरे वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी को जारी किए गए नोटिस से जुड़ा है। वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने यह मामला उठाया।
उन्होंने बताया कि छात्र को पांच लाख रुपये के निजी मुचलके का नोटिस दिया गया था। वकील के अनुसार, यह कार्रवाई उस समय की गई, जब सुप्रीम कोर्ट छात्रों के प्रदर्शन से जुड़ी एफआईआर रद्द कर चुका था और छात्रों के खिलाफ भविष्य में किसी भी तरह की जबरन कार्रवाई पर रोक लगा चुका था।
छात्र को क्यों भेजा गया नोटिस?
चार सितंबर 2026 को जारी नोटिस में पुलिस रिपोर्ट का उल्लेख किया गया था। पुलिस का आरोप था कि अक्षत त्रिपाठी विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैला रहे थे। उन पर छात्रों को कॉकरेच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रस्तावित धरने में शामिल होने के लिए उकसाने का आरोप भी लगाया गया था।
पुलिस रिपोर्ट में कहा गया था कि उनकी कथित गतिविधियों से काफी तनाव की स्थिति पैदा हुई। साथ ही लड़ाई-झगड़े और शांति भंग होने की आशंका भी जताई गई थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने बीएनएसएस की धाराओं 126 और 135 के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार माना।
पांच लाख के निजी मुचलके का मामला
कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने अक्षत त्रिपाठी को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। इसमें उनसे पूछा गया था कि शांति बनाए रखने के लिए पांच लाख रुपये का निजी मुचलका क्यों न लिया जाए। इसके साथ ही दो जमानतदारों से भी पांच-पांच लाख रुपये के मुचलके की मांग की गई थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नोटिस पर कार्रवाई होने वाली थी। हालांकि, मामला प्रेस में आने के बाद इसे वापस ले लिया गया। वकील ने कहा कि अधिकारियों की इस तरह की कार्रवाई से छात्रों के बीच डर का माहौल पैदा हो सकता है।
नोटिस वापस होने के बाद भी कोर्ट नाराज
नोटिस वापस लिए जाने की जानकारी पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सवाल किया कि अब कार्रवाई का आधार क्या रह गया है। इस पर वकील ने कहा कि नोटिस वापस लेने से कथित अवमानना खत्म नहीं होती। उन्होंने इसे सुप्रीम कोर्ट की गरिमा से जुड़ा मामला बताया।
इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सख्त टिप्पणी की। उन्होंने सवाल उठाया कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस कैसे जारी किया। सीजेआई ने कहा, 'मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की? हमने साफ कहा था कि किसी छात्र के खिलाफ जबरन कार्रवाई नहीं होगी। कोई मजिस्ट्रेट हमारे आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।'
सुप्रीम कोर्ट अब क्या करेगा?
चीफ जस्टिस ने वरिष्ठ अधिवक्ता से नोटिस को याचिका के जरिए रिकॉर्ड पर लाने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि वह संबंधित अधिकारी से इस कार्रवाई को लेकर स्पष्टीकरण मांगेगा।
इसका मतलब है कि नोटिस वापस लिए जाने के बावजूद मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट अब यह देखेगा कि उसके पहले के आदेश के बावजूद छात्र के खिलाफ कार्रवाई किस आधार पर की गई। वकील ने इसे कोर्ट के आदेश की अवहेलना बताया है।
ग्रेटर नोएडा में छात्र अक्षत त्रिपाठी को सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन में छात्रों को शामिल होने के लिए उकसाने के आरोप में नोटिस दिया गया था। इसमें पांच लाख रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों से पांच-पांच लाख रुपये की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई पर पहले ही रोक लगा चुका था। नोटिस वापस लिए जाने के बावजूद कोर्ट ने कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई और अधिकारी से जवाब मांगने के संकेत दिए।
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