रॉबर्ट ई हॉल और माइकल वुडफोर्ड को मिला अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार

HIGHLIGHTS
- अर्थशास्त्र का यह पुरस्कार वर्ष 1969 में पहली बार दिया गया था।
- अमर्त्य सेन और अभिजीत बनर्जी भी यह पुरस्कार जीत चुके हैं।
- एक साल में अधिकतम तीन लोगों के बीच पुरस्कार साझा किया जा सकता है।
वर्ष 2026 के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार की आधिकारिक घोषणा कर दी गई है। इस साल यह प्रतिष्ठित पुरस्कार अमेरिकी मूल के अर्थशास्त्रियों रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड को संयुक्त रूप से दिया गया है। यह सम्मान ‘अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में अर्थशास्त्र में स्वेरिगेस रिस्कबैंक पुरस्कार’ के नाम से जाना जाता है।
दोनों अर्थशास्त्रियों को व्यापक अर्थव्यवस्था से जुड़े मॉडल विकसित करने के लिए सम्मानित किया गया है। इन मॉडलों ने नीति निर्माताओं को अर्थव्यवस्था में स्थिरता बनाए रखने में मदद की है। मौजूदा समय में दुनिया के कई देश आर्थिक अनिश्चितता, मंदी की आशंका और महंगाई के दबाव का सामना कर रहे हैं। ऐसे में यह शोध वित्तीय नीतियों को दिशा देने में अहम भूमिका निभा रहा है।
रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड को किस शोध के लिए मिला पुरस्कार?
रॉयल स्वीडिश अकादमी की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, दोनों अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक स्थिरता से जुड़े जटिल सिद्धांतों को ऐसे मॉडलों में विकसित किया, जिनका इस्तेमाल व्यावहारिक रूप से किया जा सकता है।
नीतिगत फैसलों का सही समय: उनके शोध में बताया गया है कि उचित समय पर राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों से जुड़े कदम उठाने से अर्थव्यवस्था में होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
मंदी और तेज आर्थिक वृद्धि के जोखिमों पर नियंत्रण: इन मॉडलों के आधार पर तैयार की गई नीतियां मंदी की अवधि कम करने के साथ ही अत्यधिक तेज विकास दर से पैदा होने वाले जोखिमों को संतुलित करने में भी सहायक हो सकती हैं।
केंद्रीय बैंकों और वित्त मंत्रालयों के लिए उपयोगी: यह शोध आर्थिक संकट और झटकों के दौरान समय पर फैसले लेने के लिए दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों और वित्त मंत्रालयों को वैज्ञानिक आधार उपलब्ध कराता है।
अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार का इतिहास और चयन प्रक्रिया
अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार का इतिहास अन्य मूल नोबेल पुरस्कारों से कुछ अलग है।
स्थापना और आधिकारिक नाम: इस पुरस्कार का आधिकारिक नाम ‘अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में स्वेरिगेस रिस्कबैंक पुरस्कार’ है। इसकी स्थापना स्वीडन के केंद्रीय बैंक ने वर्ष 1968 में की थी।
पुरस्कार वितरण: यह पुरस्कार अल्फ्रेड नोबेल की वर्ष 1895 की मूल वसीयत में शामिल पांच पुरस्कारों में से एक नहीं था। इसके बावजूद इसे हर साल 10 दिसंबर को नोबेल की पुण्यतिथि पर अन्य नोबेल पुरस्कारों के साथ प्रदान किया जाता है।
अब तक कितनी बार मिला सम्मान: वर्ष 1969 में पहली बार दिए जाने के बाद से यह पुरस्कार 57 बार प्रदान किया जा चुका है और कुल 99 लोगों को सम्मानित किया गया है। इसके नियमों के मुताबिक, एक वर्ष में अधिकतम तीन लोगों के बीच पुरस्कार साझा किया जा सकता है।
अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार से भारत का क्या संबंध है?
अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार के इतिहास में भारत से जुड़े अर्थशास्त्रियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
भारतीय मूल के विजेता: वर्ष 1998 में अमर्त्य सेन को आर्थिक असमानता, गरीबी और मानव कल्याण से जुड़े वेलफेयर इकोनॉमिक्स में योगदान के लिए यह पुरस्कार मिला था। इसके बाद वर्ष 2019 में अभिजीत बनर्जी को वैश्विक गरीबी उन्मूलन के लिए उनके प्रयोगात्मक दृष्टिकोण पर किए गए काम के लिए सम्मानित किया गया।
सबसे कम उम्र की महिला और सबसे उम्रदराज विजेता: वर्ष 2019 में अभिजीत बनर्जी के साथ पुरस्कार साझा करने वाली फ्रेंच-अमेरिकी अर्थशास्त्री एस्तेर डुफ्लो 46 वर्ष की उम्र में यह सम्मान पाने वाली सबसे कम उम्र की महिला बनीं। वहीं, वर्ष 2007 में लियोनिद हुरविज को 90 वर्ष की उम्र में पुरस्कार मिला। उन्हें ‘मैकेनिज्म डिजाइन थ्योरी’ के लिए सम्मानित किया गया था और वह इसे पाने वाले सबसे उम्रदराज अर्थशास्त्री बने।
रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड का शोध इस बात को सामने रखता है कि आर्थिक नीतियां केवल सैद्धांतिक आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं। सही समय पर लागू किए गए राजकोषीय और मौद्रिक कदम लोगों के जीवन और आजीविका को मंदी के प्रभाव से बचाने में मदद कर सकते हैं। यह पुरस्कार वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए स्थिर और मजबूत भविष्य की नींव रखने में मैक्रोइकोनॉमिक मॉडलों की अहमियत को रेखांकित करता है।
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