RBI ने बढ़ाया रेपो रेट, होम लोन की EMI पर पड़ेगा सीधा असर

HIGHLIGHTS
- MPC ने सर्वसम्मति से 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ोतरी का फैसला लिया।
- आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को फैसले की जानकारी दी।
- 30 लाख रुपये के होम लोन की EMI करीब 476 रुपये बढ़ सकती है।
भारतीय रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति को लेकर अहम फैसला लिया है। करीब साढ़े तीन साल के अंतराल यानी फरवरी 2023 के बाद मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने सर्वसम्मति से रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी का निर्णय लिया है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को इसकी जानकारी दी। इस फैसले का असर आम लोगों की जेब पर भी देखने को मिल सकता है।
रेपो रेट बढ़ने से EMI पर क्या होगा असर?
आरबीआई ने रेपो रेट को 5.25 फीसदी से बढ़ाकर 5.50 फीसदी कर दिया है। यानी इसमें 0.25 फीसदी या 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी हुई है। इसका मतलब है कि बैंकों के लिए फंड जुटाने की लागत बढ़ सकती है। ऐसे में बैंक होम लोन समेत अन्य कर्ज की ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी कर सकते हैं।
30 लाख रुपये के होम लोन का ऐसे समझें हिसाब
मान लीजिए आपने 8.5 फीसदी ब्याज दर पर 20 साल के लिए 30 लाख रुपये का होम लोन लिया है। इस स्थिति में आपकी मासिक EMI करीब 26,035 रुपये होगी। अब अगर ब्याज दर 0.25 फीसदी बढ़कर 8.75 फीसदी हो जाती है, तो मासिक EMI लगभग 26,511 रुपये हो सकती है।
इस तरह हर महीने करीब 476 रुपये अतिरिक्त देने होंगे। सालभर में यह अतिरिक्त भुगतान करीब 5,712 रुपये होगा। हालांकि, कई बार बैंक EMI बढ़ाने के बजाय लोन की अवधि बढ़ा देते हैं। ऐसी स्थिति में ग्राहक को पूरे लोन पर अधिक ब्याज चुकाना पड़ सकता है।
50 लाख रुपये के लोन पर कितना बढ़ सकता है बोझ?
इसी तरह 50 लाख रुपये के लोन को 25 साल की अवधि और 7.50 फीसदी ब्याज दर पर लिया गया है, तो इसकी मासिक EMI करीब 36,950 रुपये बनती है। रेपो रेट बढ़ने के बाद अगर बैंक पूरी 0.25 फीसदी बढ़ोतरी ग्राहक तक पहुंचाते हैं, तो ब्याज दर 7.75 फीसदी हो जाएगी।
ऐसे में मासिक किस्त करीब 817 रुपये बढ़कर लगभग 37,767 रुपये हो सकती है। पूरे लोन की अवधि के दौरान अतिरिक्त ब्याज का बोझ करीब 2.45 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। बड़े कर्ज पर इसका असर और ज्यादा हो सकता है। बैंक ग्राहक की EMI बढ़ा सकते हैं या लोन की अवधि बढ़ा सकते हैं। दोनों परिस्थितियों में कर्जदार को अतिरिक्त भुगतान करना पड़ेगा।
MPC का रुख क्या रहा है?
मौद्रिक नीति समिति ने अगस्त में रेपो रेट को 5.25 फीसदी पर ही बनाए रखा था। उस समय समिति ने मुद्रास्फीति के रुझान को लेकर और स्पष्टता का इंतजार करने का फैसला किया था। समिति ने आर्थिक वृद्धि और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया था। MPC का तटस्थ रुख यह संकेत देता है कि वह आर्थिक स्थिति पर लगातार नजर रख रही है।
रेपो रेट क्यों महत्वपूर्ण है?
रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर वाणिज्यिक बैंक आरबीआई से कर्ज लेते हैं। इस दर में बदलाव का असर बैंकों की ओर से ग्राहकों को दिए जाने वाले लोन की ब्याज दरों पर पड़ सकता है।
रेपो रेट बढ़ने या घटने से होम लोन, कार लोन और दूसरे उपभोक्ता ऋण महंगे या सस्ते हो सकते हैं। इसी वजह से इसका प्रभाव आम लोगों के साथ-साथ उद्योगों पर भी पड़ता है। आरबीआई रेपो रेट का इस्तेमाल महंगाई को नियंत्रित करने और आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए करता है।
किस आधार पर फैसला लेती है MPC?
आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में देश की आर्थिक स्थिति के साथ सबसे अहम महंगाई दर को ध्यान में रखकर फैसला लिया जाता है। जब बाजार में महंगाई अधिक होती है, तो आरबीआई रेपो रेट बढ़ा सकता है या उसे ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकता है। इसका उद्देश्य लोगों के खर्च को कम करना और महंगाई को नियंत्रित करना होता है।
वहीं, जब अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ाने की जरूरत होती है, तब ब्याज दरों में कटौती की जाती है।
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