चुनाव आयुक्तों को कानूनी छूट देने वाले कानून को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब

HIGHLIGHTS
- एडीआर ने 2023 के कानून की धारा 16 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
- अदालत ने केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया।
- याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के उल्लंघन का दावा किया गया है।
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को आधिकारिक कामकाज के दौरान कानूनी कार्रवाई से मिली व्यापक छूट का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने इस प्रावधान को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर मंगलवार को केंद्र सरकार और भारतीय निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया। इस कदम के बाद चुनाव आयुक्तों की कानूनी सुरक्षा और जवाबदेही से जुड़े सवाल एक बार फिर चर्चा में हैं। याचिका में कहा गया है कि इतनी व्यापक छूट संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों को सामान्य कानूनी प्रक्रिया से बाहर कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा। यह याचिका मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित वर्ष 2023 के कानून की धारा 16 को चुनौती देती है। मामले की अगली सुनवाई दो नवंबर को होने की संभावना है।
विवाद का मुख्य विषय वह प्रावधान है, जिसके तहत मौजूदा और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों तथा चुनाव आयुक्तों को आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों, कार्रवाइयों या दिए गए बयानों के संबंध में दीवानी और आपराधिक मुकदमों से सुरक्षा प्रदान की गई है।
धारा 16 में क्या प्रावधान है?
धारा 16 के मुताबिक, कोई भी अदालत ऐसे व्यक्ति के खिलाफ दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं कर सकती और न ही उसे जारी रख सकती, जो मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त है अथवा इस पद पर रह चुका है। यह सुरक्षा उन कार्यों, गतिविधियों और बयानों पर लागू होती है, जिन्हें संबंधित व्यक्ति ने अपने आधिकारिक कर्तव्य या जिम्मेदारी निभाते समय किया हो अथवा आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन के तौर पर किया गया हो।
इसी व्यापक कानूनी सुरक्षा को लेकर एडीआर ने याचिका दायर की है।
क्या कानूनी छूट संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है?
एडीआर का तर्क है कि धारा 16 संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन करती है। याचिका के अनुसार, इस तरह की व्यापक कानूनी सुरक्षा से अधिकारियों की जवाबदेही कमजोर हो सकती है। साथ ही, कथित मनमानी या भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की न्यायिक जांच में भी बाधा आ सकती है।
हालांकि, ये याचिकाकर्ता की ओर से पेश की गई दलीलें हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
चुनाव आयोग की शक्तियों को लेकर पहले भी उठे सवाल
पांच अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य याचिका पर केंद्र सरकार, निर्वाचन आयोग और तीनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया था। उस याचिका में यह सवाल उठाया गया था कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था की शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं या उसकी ओर से अकेले प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी थी कि आयोग का कामकाज उसे नियंत्रित करने वाले कानून के अनुरूप नहीं है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 का हवाला देते हुए कहा गया कि चुनावों की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण की शक्तियां निर्वाचन आयोग को एक संस्था के रूप में दी गई हैं, न कि केवल मुख्य चुनाव आयुक्त को व्यक्तिगत तौर पर।
इस मामले में भी अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले कानून पर भी विवाद क्यों?
वर्ष 2023 में बने कानून की संवैधानिक वैधता को लेकर भी न्यायिक समीक्षा जारी है। विवाद उस व्यवस्था पर है, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखा गया है।
23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ ने इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को संविधान पीठ के पास भेजने के मुद्दे पर अलग-अलग राय दी थी। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग खारिज कर दी थी, जबकि न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने इसे संविधान की व्याख्या से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल मानते हुए संविधान पीठ के समक्ष रखने का समर्थन किया था।
दोनों न्यायाधीशों ने मामले के दस्तावेज मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष रखने का निर्देश दिया था, ताकि संविधान पीठ गठित करने पर विचार किया जा सके।
इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की ओर से नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। इससे पहले मार्च 2023 में अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम व्यवस्था के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश शामिल थे।
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