दिल्ली: 16 वर्षीय लड़की के गर्भपात मामले में हाईकोर्ट सख्त, डॉक्टर को नहीं मिली राहत

HIGHLIGHTS
- दिल्ली हाईकोर्ट ने डॉक्टर की याचिका पर राहत देने से इनकार किया।
- मामला वर्ष 2019 में 16 वर्षीय लड़की के गर्भपात से जुड़ा है।
- अदालत ने उम्र सत्यापन के लिए दस्तावेजों की जांच को जरूरी बताया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 16 वर्षीय नाबालिग लड़की के अवैध गर्भपात और संबंधित अधिकारियों को जानकारी नहीं देने के आरोप में घिरी डॉक्टर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने या उसमें दखल देने से इनकार कर दिया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि डॉक्टर केवल मरीज के साथ आए किसी व्यक्ति के मौखिक दावे के आधार पर उम्र तय नहीं कर सकते। मरीज की उम्र की पुष्टि के लिए उचित दस्तावेजों की जांच करना जरूरी है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला जुलाई 2019 का है। आरोप है कि एक अस्पताल में 16 वर्षीय लड़की का करीब छह सप्ताह का गर्भ गिराया गया था। पीड़िता के बयान के अनुसार, एक सह-आरोपी महिला ने खुद को उसकी चाची बताया और अस्पताल के कर्मचारियों को जानकारी दी कि गर्भ लड़की के प्रेमी से है।
आरोप है कि उस महिला ने अस्पताल के रिकॉर्ड में लड़की की उम्र 20 साल दर्ज करवा दी थी।
डॉक्टर ने क्या दलील दी?
मामले में आरोपी डॉक्टर ने हाईकोर्ट में कहा कि गर्भपात के समय लड़की की उम्र 20 वर्ष बताई गई थी और उसने खुद इस प्रक्रिया के लिए सहमति दी थी।
हालांकि, अदालत ने पाया कि अस्पताल में भर्ती करते समय मरीज या उसके साथ आए लोगों से कोई पहचान पत्र या निवास प्रमाण पत्र नहीं लिया गया था।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने 5 अगस्त को दिए फैसले में कहा कि कानून के अनुसार मरीज की उम्र का पता लगाना और उसे रिकॉर्ड में दर्ज करना जरूरी है।
अदालत ने कहा कि केवल मौखिक जानकारी के आधार पर भरोसा कर डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। उम्र की पुष्टि के लिए दस्तावेजों की जांच करना आवश्यक है।
MTP एक्ट के तहत क्या है नियम?
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के अनुसार, नाबालिग खुद गर्भपात के लिए सहमति देने में सक्षम नहीं होती। नाबालिग का गर्भपात अभिभावक की लिखित सहमति के बिना नहीं किया जा सकता।
पॉक्सो एक्ट के उल्लंघन का आरोप
पॉक्सो एक्ट की धारा 19 के तहत डॉक्टरों को नाबालिग के गर्भवती होने की जानकारी देना अनिवार्य है। ऐसा नहीं करने पर धारा 21 के तहत कार्रवाई का प्रावधान है।
इस मामले में डॉक्टर द्वारा जानकारी नहीं देने के कारण गर्भपात के करीब 70 दिन बाद एफआईआर दर्ज हो सकी थी।
ट्रायल कोर्ट का आदेश रहेगा जारी
डॉक्टर ने ट्रायल कोर्ट के सितंबर 2020 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें मामले की आगे जांच के निर्देश दिए गए थे। इसके बाद पुलिस ने सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की, जिसमें डॉक्टर को आईपीसी की धारा 313 (महिला की सहमति के बिना गर्भपात) और पॉक्सो एक्ट की धारा 21 के तहत आरोपी बनाया गया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद तथ्यों के आधार पर डॉक्टर के खिलाफ प्रथम दृष्टया अपराध बनता है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए डॉक्टर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का फैसला बरकरार रखा।
Comments0
Leave a comment
Join the conversation — your email will not be published.






























Reader comments
No comments yet
Be the first to share your perspective on this story.