गेहूं से जुड़े कारोबार में लगे किसानों और निर्यातकों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। केंद्र सरकार ने गेहूं के आटे और उससे बने उत्पादों के निर्यात पर लगी सख्ती में आंशिक ढील देने का फैसला किया है। सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के तहत 5 लाख मीट्रिक टन गेहूं आटे के निर्यात की अनुमति दी गई है।
यह फैसला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि वर्ष 2022 में घरेलू बाजार में कीमतों को काबू में रखने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से गेहूं और उससे जुड़े उत्पादों के निर्यात पर रोक लगा दी गई थी। करीब तीन साल बाद पहली बार इस प्रतिबंध में ढील दी गई है, जिससे भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सीमित स्तर पर दोबारा प्रवेश का मौका मिलेगा।
डीजीएफटी की अधिसूचना में क्या कहा गया?
विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने 16 जनवरी को जारी अधिसूचना में स्पष्ट किया है कि गेहूं का आटा और उससे जुड़े उत्पाद सामान्य रूप से प्रतिबंधित श्रेणी में ही रहेंगे। हालांकि विशेष प्रावधान के तहत सरकार ने अधिकतम 5 लाख मीट्रिक टन तक निर्यात की अनुमति दी है।
इस कोटे के अंतर्गत निर्यात करने के लिए संबंधित निर्यातकों को डीजीएफटी से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होगा। यह फैसला रबी सीजन में गेहूं की बुवाई पूरी होने के बाद लिया गया है, जिससे घरेलू आपूर्ति पर असर न पड़े।
आवेदन की प्रक्रिया और समय-सीमा
डीजीएफटी ने निर्यात के इच्छुक कारोबारियों के लिए आवेदन की समय-सारिणी भी तय कर दी है—
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पहला चरण: 21 जनवरी 2026 से 31 जनवरी 2026 तक आवेदन स्वीकार किए जाएंगे।
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रोलिंग विंडो: यदि तय कोटे में निर्यात की मात्रा शेष रहती है, तो हर महीने के अंतिम 10 दिनों में आवेदन लिए जाएंगे।
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अनुमति की वैधता: निर्यात की मंजूरी जारी होने की तारीख से छह महीने तक प्रभावी रहेगी।
निर्यात की मात्रा का आवंटन सरकार की विशेष एग्जिम सुविधा समिति द्वारा किया जाएगा।
कौन कर सकेगा निर्यात के लिए आवेदन?
सरकार ने इस सुविधा का लाभ केवल पात्र और पंजीकृत इकाइयों तक सीमित रखा है। पात्रता इस प्रकार है—
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निर्माता निर्यातक: वे फ्लोर मिल्स या प्रोसेसिंग यूनिट्स, जिनके पास वैध आयात-निर्यात कोड (IEC) और एफएसएसएआई लाइसेंस है, आवेदन कर सकते हैं।
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मर्चेंट निर्यातक: ऐसे व्यापारी भी आवेदन के पात्र होंगे, जिनके पास वैध IEC और FSSAI लाइसेंस हो तथा किसी अधिकृत फ्लोर मिल या निर्माता के साथ आपूर्ति या सहयोग का लिखित समझौता मौजूद हो।
सरकार का यह कदम एक संतुलित रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, जिससे घरेलू जरूरतें सुरक्षित रहें और अतिरिक्त उत्पादन को वैश्विक बाजार में खपाने का रास्ता भी खुले। इससे गेहूं प्रसंस्करण उद्योग को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।
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