'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर बड़ा अपडेट, समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने बताई पूरी तैयारी

HIGHLIGHTS
- लोकसभा ने 'वन नेशन, वन इलेक्शन' विधेयक को 41 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा है।
- समिति अब तक दिल्ली में 25 बैठकें आयोजित कर चुकी है।
- प्रस्ताव पर चर्चा के लिए करीब 10 राज्यों का दौरा किया गया है।
देश में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'वन नेशन, वन इलेक्शन' को लेकर बहस तेज हो गई है। इस बीच समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने कहा कि इस विधेयक का प्रमुख उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक ही समय पर कराना है।
उन्होंने बताया कि लोकसभा ने इस विधेयक को 41 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा है। समिति प्रस्ताव के अलग-अलग पहलुओं पर चर्चा कर रही है। साथ ही उन विकल्पों का भी अध्ययन किया जा रहा है, जिनके जरिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर के चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं।
समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने क्या बताया?
'वन नेशन, वन इलेक्शन' समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि इस व्यवस्था को लागू करने के लिए जरूरी संवैधानिक, राजनीतिक और व्यावहारिक पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही विभिन्न पक्षों से सुझाव भी मांगे जा रहे हैं, ताकि चुनाव प्रक्रिया को व्यवस्थित और प्रभावी बनाया जा सके।
भारत में 1951 से 1967 के बीच एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था खत्म होने के सवाल पर चौधरी ने बताया कि 1952 से 1967 के दौरान लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चार आम चुनाव एक साथ हुए थे। उस समय चुनावों का समय समान रखने के लिए आठ से नौ राज्यों की विधानसभाओं को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही भंग कर दिया गया था। इसका उद्देश्य लोकसभा चुनाव के साथ संबंधित राज्यों में भी विधानसभा चुनाव कराना था।
उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि संविधान निर्माताओं और संविधान सभा के सदस्यों की सोच में भी एक साथ चुनाव कराने का विचार शामिल था। उनके मुताबिक, संविधान की भावना, उद्देश्य और मूल मंशा को समझने पर 'वन नेशन, वन इलेक्शन' की अवधारणा का संकेत मिलता है। इसी विचार के तहत उस समय कुछ राज्य विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर लोकसभा के साथ चुनाव कराए गए थे।
समिति अब तक कर चुकी है 25 बैठकें
समिति की गतिविधियों और अब तक हुई बैठकों के बारे में पीपी चौधरी ने बताया कि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' को लेकर गठित उच्चस्तरीय समिति दिल्ली में अब तक 25 बैठकें कर चुकी है। इसके अलावा करीब 10 राज्यों का दौरा कर अलग-अलग हितधारकों के साथ विस्तार से चर्चा की गई है।
इन दौरों के दौरान उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, नागरिक समाज संगठनों, राजनीतिक दलों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से बातचीत हुई। इनमें राज्यों के मुख्य सचिव, विभिन्न विभागों के सचिव, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष भी शामिल रहे।
चौधरी ने कहा कि जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और विभिन्न संगठनों ने अपने अनुभव के आधार पर अहम सुझाव दिए हैं। इन विचारों से समिति को प्रस्ताव के अलग-अलग पहलुओं को समझने और अपनी रिपोर्ट तैयार करने में मदद मिली है।
क्षेत्रीय दलों और संघीय ढांचे पर भी उठे सवाल
समिति के अध्यक्ष ने बताया कि एक साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव को लेकर अक्सर यह आशंका जताई जाती है कि इससे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का प्रभाव घट सकता है। इसके अलावा यह सवाल भी उठता है कि इस व्यवस्था से देश के संघीय ढांचे और संविधान के मूल स्वरूप पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
1967 से 2024 तक के चुनावी इतिहास का दिया हवाला
पीपी चौधरी ने बताया कि विशेषज्ञों ने अपनी बात रखते हुए 1967 से 2024 तक के चुनावी इतिहास का उल्लेख किया। इसमें 1967, 1971, 1977, 1980, 1984 और 1989 के चुनावों के साथ 1989 से 2014 तक गठबंधन सरकारों के दौर और 2014, 2019 तथा 2024 के चुनावों का भी विश्लेषण किया गया।
उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों के मुताबिक, जब लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं, तो केंद्र में मजबूत सत्ताधारी दल कई बार राज्यों के चुनावों में भी बड़ी जीत हासिल कर लेते हैं। ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के लिए अपनी स्थिति मजबूत करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
चौधरी ने कहा कि समिति विशेषज्ञों, राजनीतिक दलों, जनप्रतिनिधियों और अन्य हितधारकों से मिले सुझावों का अध्ययन कर रही है। इसका मकसद ऐसी चुनावी व्यवस्था तैयार करना है, जिससे देश में चुनाव प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो और राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती मिल सके।
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