भौतिकी के नोबेल पुरस्कार का ऐलान, फ्रांसिस हैल्जेन को मिला सम्मान

HIGHLIGHTS
- रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने मंगलवार को पुरस्कार की घोषणा की।
- हैल्जेन ने 1988 में अंटार्कटिका की बर्फ के इस्तेमाल का विचार दिया था।
- आइसक्यूब वेधशाला को वर्ष 2011 में पूरा किया गया था।
रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने मंगलवार को भौतिकी के नोबेल पुरस्कार की घोषणा कर दी। इस वर्ष यह प्रतिष्ठित सम्मान फ्रांसिस हैल्जेन को दिया गया है। उन्हें आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान और अंतरिक्ष से आने वाले बेहद उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो की खोज के लिए यह पुरस्कार दिया गया है। वर्ष 2025 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार जॉन क्लार्क, मिशेल एच. डेवोरेट और जॉन एम. मार्टिनिस को प्रदान किया गया था।
रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने हैल्जेन के उस वैज्ञानिक योगदान को मान्यता दी, जिसके जरिए उन्होंने ऐसी अवधारणा को वास्तविक रूप दिया, जिसे कभी लगभग असंभव माना जाता था। इसके तहत अंटार्कटिका की करीब एक घन किलोमीटर बर्फ को ब्रह्मांड से आने वाले बेहद मुश्किल से पकड़ में आने वाले कणों का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया गया।
हैल्जेन की किस खोज के लिए मिला नोबेल?
न्यूट्रिनो प्रकृति में मौजूद सबसे अधिक संख्या वाले कणों में से एक हैं। हालांकि, इनका पता लगाना बेहद कठिन होता है। इन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता और ये पदार्थ के साथ बेहद कमजोर तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं। हर सेकंड अरबों न्यूट्रिनो हमारे शरीर से होकर गुजरते हैं, लेकिन सामान्य तौर पर इनका कोई प्रत्यक्ष प्रभाव महसूस नहीं होता।
यही विशेषता न्यूट्रिनो को खगोल विज्ञान के लिए बेहद अहम बनाती है। आवेशित कणों की दिशा चुंबकीय क्षेत्र बदल सकते हैं, जबकि उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो ब्रह्मांड में बहुत लंबी दूरी लगभग सीधी रेखा में तय कर सकते हैं। इस दौरान वे अपने स्रोत से जुड़ी जानकारी भी अपने साथ लेकर चलते हैं। इस कारण न्यूट्रिनो ब्रह्मांड के कुछ सबसे शक्तिशाली और हिंसक क्षेत्रों से आने वाले संदेशवाहक के रूप में काम कर सकते हैं।
दक्षिणी ध्रुव की बर्फ को विशाल कण डिटेक्टर के तौर पर इस्तेमाल करने का विचार
वैज्ञानिकों का मानना है कि अंतरिक्ष में प्राकृतिक कण त्वरक मौजूद हैं। ये ऐसे कण पैदा कर सकते हैं, जिनकी ऊर्जा मानव निर्मित सबसे शक्तिशाली कण त्वरकों से भी लाखों गुना अधिक हो सकती है। हालांकि, इन ब्रह्मांडीय त्वरकों की पहचान करना और उनके काम करने के तरीके को समझना लंबे समय से चुनौती रहा है।
फ्रांसिस हैल्जेन ने 1988 में इस समस्या के समाधान के लिए एक महत्वाकांक्षी विचार पेश किया था। उनका प्रस्ताव था कि दक्षिणी ध्रुव के नीचे मौजूद विशाल और पारदर्शी बर्फ की परत को एक विशाल कण डिटेक्टर के तौर पर इस्तेमाल किया जाए।
जब कोई उच्च ऊर्जा वाला न्यूट्रिनो कभी-कभार बर्फ में मौजूद परमाणु के नाभिक से टकराता है, तो इस प्रक्रिया में प्रकाश की एक छोटी चमक पैदा हो सकती है। आइसक्यूब वेधशाला अंटार्कटिका की बर्फ में गहराई तक लगाए गए हजारों प्रकाश सेंसरों के जरिए इन बेहद छोटी चमकों का पता लगाती है।
इन संकेतों की मदद से वैज्ञानिक न्यूट्रिनो की दिशा और ऊर्जा का पता लगा सकते हैं। दक्षिणी ध्रुव की स्थिति इस प्रयोग के लिए कई फायदे देती है। अंटार्कटिका की विशाल बर्फ प्रयोग के लिए बहुत बड़ा क्षेत्र उपलब्ध कराती है। इसके अलावा दक्षिणी ध्रुव का अपेक्षाकृत स्थिर वातावरण और बेहद कम पृष्ठभूमि हस्तक्षेप भी इस प्रयोग के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराता है।
कई वर्षों में तैयार हुई आइसक्यूब वेधशाला
आइसक्यूब वेधशाला को तैयार करने में कई साल लगे और वर्ष 2011 में यह पूरी हुई। यह करीब एक घन किलोमीटर बर्फ के क्षेत्र में फैली हुई है। इसके बाद शोधकर्ताओं ने उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो का पता लगाना शुरू किया।
बाद के अवलोकनों से ऐसे प्रमाण मिले कि इनमें से कुछ कण हमारे सौर मंडल से बहुत दूर स्थित स्रोतों से आए थे। इस खोज ने ब्रह्मांड को समझने का एक नया रास्ता खोला, जिसे न्यूट्रिनो खगोल विज्ञान कहा गया।
भौतिकी के नोबेल समिति के अध्यक्ष मार्क पियर्स ने कहा, "फ्रांसिस हैल्जेन ने शोधकर्ताओं और इंजीनियरों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम का नेतृत्व किया, जिन्होंने हमें एक शानदार उपकरण उपलब्ध कराया है।" पियर्स के अनुसार, हैल्जेन की वैज्ञानिक दृष्टि ने खगोल विज्ञान के एक नए स्वरूप की दिशा तैयार करने में मदद की।
आज भी जुटाए जा रहे न्यूट्रिनो से जुड़े आंकड़े
आइसक्यूब वेधशाला आज भी न्यूट्रिनो से संबंधित घटनाओं का आंकड़ा जुटा रही है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि लगातार बढ़ते आंकड़ों से उन ब्रह्मांडीय स्रोतों की पहचान करने में मदद मिलेगी, जहां से ये अत्यधिक ऊर्जा वाले कण निकलते हैं। इससे ब्रह्मांड में अब तक अज्ञात घटनाओं के बारे में भी जानकारी मिल सकती है।
यह नोबेल सम्मान केवल एक रहस्यमय कण से जुड़े संकेत की खोज को मान्यता नहीं देता, बल्कि ब्रह्मांड को देखने और समझने के एक नए तरीके को भी सम्मानित करता है। इस तरीके में प्रकाश के बजाय ऐसे कणों का अध्ययन किया जाता है, जो लगभग बिना प्रभावित हुए पूरे ब्रह्मांड में लंबी दूरी तय कर सकते हैं।
सोमवार को हुआ था चिकित्सा के नोबेल का एलान
इससे पहले सोमवार को 2026 का चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार अमेरिका के कार्ल डाइसेरोथ, जर्मनी के पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल को दिया गया था। इन वैज्ञानिकों ने ऑप्टोजेनेटिक्स नाम की ऐसी तकनीक विकसित करने में मदद की, जिसके जरिए रोशनी की सहायता से दिमाग की अलग-अलग तंत्रिका कोशिकाओं को नियंत्रित कर उनके काम को समझा जा सकता है।
बता दें कि इन वैज्ञानिकों को दिसंबर में स्वीडन के स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। वर्ष 2026 में नोबेल पुरस्कार की राशि करीब 11.5 करोड़ रुपये है।
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