2008 अहमदाबाद ब्लास्ट केस: एक दोषी की फांसी पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, गुजरात सरकार को नोटिस

HIGHLIGHTS
- इन धमाकों में 56 लोगों की मौत हुई थी।
- सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अहमद बावा उर्फ अब्बू अबुबकर बरलेवी की याचिका पर सुनवाई की।
- पीठ में जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस एजी मसीह और जस्टिस संदीप मेहता शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 2008 के अहमदाबाद बम धमाकों के मामले में इंडियन मुजाहिदीन के एक सदस्य की मौत की सजा पर फिलहाल रोक लगाने का आदेश दिया। इन सिलसिलेवार धमाकों में 56 लोगों की मौत हुई थी।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस एजी मसीह और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अहमद बावा उर्फ अब्बू अबुबकर बरलेवी की याचिका पर गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया। बावा ने गुजरात हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें निचली अदालत की ओर से सुनाई गई उसकी मौत की सजा को बरकरार रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निचली अदालत का रिकॉर्ड भी तलब किया है।
हाईकोर्ट ने 38 दोषियों की मौत की सजा रखी थी बरकरार
7 जुलाई को गुजरात हाईकोर्ट ने 2008 के अहमदाबाद सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में इंडियन मुजाहिदीन के 38 सदस्यों को सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा था। अदालत ने बड़ी संख्या में लोगों की मौत, हमले की साजिश और आतंक फैलाने का दोषी मानते हुए उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने 11 अन्य दोषियों को मिली उम्रकैद की सजा को भी कायम रखा था। अदालत के मुताबिक, गुजरात और केरल में आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों में उनकी भूमिका तथा साजिश के लिए रसद संबंधी सहायता उपलब्ध कराने की बात अभियोजन पक्ष साबित कर चुका था।
जुलाई 2008 में 21 सिलसिलेवार धमाकों में 56 लोगों की मौत
26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद के अलग-अलग इलाकों में करीब 70 मिनट के दौरान 21 सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इन हमलों में 56 लोगों की जान गई थी, जबकि 200 से अधिक लोग घायल हुए थे।
धमाके उन अस्पतालों में भी हुए थे, जहां घायलों को इलाज के लिए ले जाया जा रहा था। यह भारत में किसी आतंकवादी हमले के दौरान चिकित्सा केंद्रों को निशाना बनाए जाने वाली पहली ऐसी घटनाओं में से एक थी।
हाईकोर्ट ने दोषियों की सभी अपीलें खारिज करते हुए विशेष अदालत के फरवरी 2022 के फैसले को बरकरार रखा था। विशेष अदालत ने इंडियन मुजाहिदीन के 38 सदस्यों को मौत की सजा और 11 अन्य को उम्रकैद सुनाई थी। राज्य सरकार ने भी दोषियों के लिए मौत की सजा की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि कुछ दोषियों का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है और किसी ने पश्चाताप नहीं दिखाया। अदालत ने जेल में उनके खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी उल्लेख किया था। अदालत के मुताबिक, रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार नहीं था, जिससे सजा में नरमी बरती जा सके।
हाईकोर्ट ने दोषियों पर लगाए गए जुर्माने को भी बरकरार रखा था। अदालत ने कहा था कि अपराध की गंभीरता, सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान, बड़े पैमाने पर हुई मौतों और लोगों के घायल होने को देखते हुए जुर्माना उचित है।
अदालत ने गुजरात सरकार को निर्देश दिया था कि वह 30 मार्च 2027 से पहले मृतकों के परिवारों को 10-10 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायलों को 5-5 लाख रुपये का मुआवजा दे।
दोषियों में प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया के पूर्व नेता सफदर नागौरी और गुजरात, मध्य प्रदेश, केरल तथा उत्तर प्रदेश समेत 11 राज्यों से जुड़े उसके सहयोगी शामिल हैं।
78 लोगों के खिलाफ चला था मुकदमा
इस मामले में 78 लोगों के खिलाफ मुकदमा चला था। अहमदाबाद धमाकों से जुड़ी 20 एफआईआर और सूरत में बरामद नहीं फटे बमों से संबंधित 15 एफआईआर समेत कुल 35 पुलिस मामलों को एक साथ जोड़ दिया गया था। विशेष अदालत ने इनमें से 49 लोगों को दोषी ठहराया था।
फरवरी 2022 में विशेष अदालत का फैसला किसी एक मामले में एक साथ 38 दोषियों को मौत की सजा सुनाए जाने का पहला मामला था। इससे पहले जनवरी 1998 में तमिलनाडु की एक टाडा अदालत ने 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में सभी 26 दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी।
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