'ड्यूटी पर आरोप लगे तो FIR से पहले जांच जरूरी', इलाहाबाद HC ने स्पेशल एससी/एसटी कोर्ट का आदेश किया रद्द

HIGHLIGHTS
- महिलाओं ने तलाशी के दौरान अभद्रता और जातिसूचक टिप्पणियों का आरोप लगाया था।
- हाईकोर्ट ने विशेष अदालत द्वारा पुलिस रिपोर्ट पर विचार न किए जाने की बात कही।
- अदालत ने पुराने मुकदमों और जनरल डायरी की प्रविष्टि पर भी विचार करने को कहा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि ड्यूटी के दौरान किसी सरकारी कर्मचारी पर आरोप लगने की स्थिति में एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से पहले मामले की सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए। हालांकि, इस प्रक्रिया को मिनी ट्रायल में नहीं बदला जा सकता। इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने महाराजगंज के उप निरीक्षक (एसआई) समेत 22 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के विशेष अदालत के आदेश को रद्द कर दिया।
घुघुली थाने में तैनात उप निरीक्षक राकेश कुमार यादव की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों को निर्देश दिया कि एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से पहले पुलिस का पक्ष और वैधानिक प्रक्रिया पर विचार किया जाए। कोर्ट ने जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को मासिक बैठकों में इन निर्देशों के पालन की निगरानी करने को भी कहा।
इसके साथ ही फैसले की प्रति न्यायिक अधिकारियों, जेटीआरआई (लखनऊ), जिलाधिकारियों, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों (एसएसपी), पुलिस अधीक्षकों (एसपी) और पुलिस आयुक्तों को भेजने का निर्देश दिया गया।
दो महिलाओं ने पुलिसकर्मियों पर अभद्रता का लगाया था आरोप
बसंतपुर गांव की दो महिलाओं ने आरोप लगाया था कि छह जून की रात उप निरीक्षक राकेश कुमार यादव, आरक्षी अमित कुमार और करीब 20 अन्य पुलिसकर्मी बिना महिला पुलिसकर्मियों के तलाशी लेने उनके घर में घुस गए थे। महिलाओं के मुताबिक, पुलिसकर्मियों के पास तलाशी वारंट भी नहीं था।
आरोप था कि पुलिसकर्मियों ने उनके साथ अभद्रता की, उन्हें शौचालय जाने से रोका और जातिसूचक टिप्पणियां कीं।
महिलाओं ने बताया कि 12 जून को पुलिस अधीक्षक से शिकायत करने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने विशेष अदालत का रुख किया। 11 अगस्त को महाराजगंज की एससी-एसटी एक्ट की विशेष अदालत ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। पुलिसकर्मियों ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के आदेश में बताई खामी
अपीलकर्ताओं के अधिवक्ता ने दलील दी कि पुलिसकर्मी अपने सरकारी दायित्व का निर्वहन कर रहे थे। घटना से संबंधित दो परस्पर विरोधी मामले पहले ही दर्ज थे और उनमें आरोपपत्र भी दाखिल हो चुके थे। ऐसे में पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज कराई गई नई शिकायत जवाबी कार्रवाई थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि विशेष अदालत के न्यायाधीश ने आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया था कि मामले में जांच की जरूरत क्यों नहीं थी। अदालत की ओर से मंगाई गई पुलिस रिपोर्ट पर भी विचार नहीं किया गया था।
कोर्ट ने गिरफ्तारी और जनरल डायरी (जीडी) में दर्ज प्रविष्टि को पुलिसकर्मियों की मौजूदगी और उनकी ड्यूटी के बीच प्रथम दृष्टया संबंध का संकेत माना। अदालत के अनुसार, विशेष अदालत को शिकायतकर्ता के परिवार और पुलिसकर्मियों से जुड़े पुराने मुकदमों पर भी विचार करना चाहिए था।
धारा 173(4) शिकायत का उपाय, सीधे FIR का आदेश देने का आधार नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 173(4) के तहत पुलिस अधीक्षक के समक्ष शिकायत करने का वैधानिक उपाय उपलब्ध है। इस प्रावधान के तहत केवल अर्जी दाखिल कर देने से विशेष अदालत को एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने का अधिकार नहीं मिल जाता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच का न्यायिक निर्देश देने की शक्ति धारा 175(3) में निहित है। साथ ही, जांच का आदेश देने की प्रक्रिया को मिनी ट्रायल में नहीं बदला जा सकता।
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