ज्ञानेश कुमार पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश बोले- पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार खो दिया

HIGHLIGHTS
- कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर एक मीडिया रिपोर्ट साझा की।
- रिपोर्ट में जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की मतदान के अधिकार संबंधी टिप्पणी का उल्लेख था।
- रमेश ने इस टिप्पणी को संविधान से जुड़े मुद्दे से जोड़ा।
कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर निशाना साधा है। पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट के जज उज्ज्वल भुइयां की मतदान के अधिकार को लेकर कथित टिप्पणी का हवाला देते हुए कहा कि ज्ञानेश कुमार अब अपने पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार खो चुके हैं।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक मीडिया रिपोर्ट साझा की, जिसमें जस्टिस भुइयां की टिप्पणी का उल्लेख किया गया था। रमेश ने दावा किया कि यह टिप्पणी बताती है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने संविधान की भावना और उसके प्रावधानों का उल्लंघन किया है।
वोटिंग के अधिकार पर जस्टिस भुइयां ने क्या कहा?
जयराम रमेश द्वारा साझा की गई मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के चलते लाखों भारतीय नागरिकों से मतदान का अधिकार छिन जाता है और उन्हें अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया जाता है, तो ऐसी प्रक्रिया अपने आप में मनमानी होगी।
कांग्रेस नेता ने कहा कि जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट रूप से अपनी राय रखी है कि वोट देने का अधिकार संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है।
कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार पर क्या आरोप लगाए?
जयराम रमेश ने दावा किया कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी से यह सामने आता है कि संवैधानिक पद पर बैठे मुख्य चुनाव आयुक्त ने संविधान के प्रावधानों और उसकी भावना का उल्लंघन किया है।
उन्होंने यह भी कहा कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी से ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
SIR को लेकर पहले से उठ रहे हैं सवाल
हाल ही में द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का दावा किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार SIR से संबंधित फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की थी।
रिपोर्ट में कहा गया था कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने उन फैसलों और आदेशों पर सवाल उठाए, जो उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना जारी किए गए थे।
चुनाव आयोग ने आपत्तियों पर क्या कहा?
इन कथित आपत्तियों से जुड़ी रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखा। आयोग की ओर से कहा गया कि किसी भी संस्थान में विचारों और टिप्पणियों में मतभेद चर्चा और विचार-विमर्श का हिस्सा होते हैं।
चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके सभी आदेशों को पूरा कानूनी समर्थन हासिल है और इन्हें स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत जारी किया जाता है। आयोग के अधिकारियों ने यह भी कहा कि SIR समेत सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे।
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