मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने पर केंद्र ने कहा- फैसला संसद का काम

HIGHLIGHTS
- केंद्र ने मैरिटल रेप को अलग अपराध बनाने का विरोध किया है।
- सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ मामले की सुनवाई कर रही है।
- अदालत ने तीन सप्ताह बाद बुधवार और गुरुवार को सुनवाई तय की।
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने का फैसला विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है, सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग से जुड़ी याचिकाओं पर तीन सप्ताह बाद अंतिम सुनवाई शुरू की जाएगी।
कोर्ट में क्या हुआ?
CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने निर्देश दिया कि इस मामले को तीन सप्ताह बाद बुधवार और गुरुवार को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने का काम संसद का है, सुप्रीम कोर्ट का नहीं।
इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 के अपवाद 2 को चुनौती दी गई है। यह प्रावधान पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 में मैरिटल रेप से जुड़े अपवाद का विस्तार है।
इसके तहत अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ संबंध बनाता है, तो उसे रेप नहीं माना जाएगा, बशर्ते पत्नी की उम्र 18 साल से कम न हो। महिलाओं की सुरक्षा को जरूरी मुद्दा बताते हुए जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या राज्य इसे रेप मानता है या नहीं।
संबंध बनाने के लिए मजबूर की गई महिला पीड़ित है: बागची
जस्टिस बागची ने कहा कि शादी में बिना मर्जी के यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर की गई महिला निश्चित रूप से पीड़ित है और पीड़ितों की सुरक्षा की जाएगी। उन्होंने कहा कि सवाल केवल यह है कि क्या राज्य इसे रेप मानता है। जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि शादी का मतलब महिला की आजादी खत्म होना नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि वह दो सवालों पर विचार करेगा। पहला, क्या मैरिटल रेप से जुड़ी छूट के बावजूद मुकदमा चलाया जा सकता है और दूसरा, क्या यह छूट खुद संविधान के अनुरूप है?
याचिकाकर्ताओं के वकील का तर्क
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट करुणा नंदी ने कहा कि अगर कोई पति अपनी पत्नी को गंभीर चोट पहुंचाता है, तो वह सिर्फ शादी के रिश्ते के आधार पर कानूनी छूट का दावा नहीं कर सकता।
नंदी ने कहा कि शादी का रिश्ता किसी व्यक्ति को पत्नी की इच्छा के खिलाफ संबंध बनाने या उसे गंभीर शारीरिक नुकसान पहुंचाने की छूट नहीं देता।
मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत हो निपटारा: केंद्र
केंद्र सरकार ने पहले अपने हलफनामे में कहा था कि वह मैरिटल रेप को अलग अपराध बनाए जाने के पक्ष में नहीं है। सरकार का कहना है कि मैरिटल रेप को अपराध मानने से शादी के रिश्तों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
केंद्र ने यह भी कहा था कि शादी के भीतर यौन संबंधों से जुड़े मामलों को सामान्य रेप के अपराध के बराबर मानने के बजाय मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत निपटाया जाना चाहिए।
2022 में दिल्ली हाई कोर्ट ने इस सवाल पर बंटा हुआ फैसला दिया था कि मैरिटल रेप को आपराधिक अपराध माना जाना चाहिए या नहीं। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
Comments0
Leave a comment
Join the conversation — your email will not be published.




























Reader comments
No comments yet
Be the first to share your perspective on this story.