सुप्रीम कोर्ट में अभद्र भाषा के आरोप में गिरफ्तार दो विधि छात्रों को कोर्ट ने दी जमानत

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट हंगामा मामले में दो कानून छात्रों को कोर्ट से जमानत मिली।
- अदालत ने अभद्र व्यवहार की निंदा की, लेकिन लंबी हिरासत को उचित नहीं माना।
- दोनों छात्रों को शर्तों के साथ रिहा करने का आदेश दिया गया।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने, कोर्ट रूम में कागजात फेंकने, सुरक्षा कर्मी से मारपीट करने और कार्यवाही में बाधा डालने के आरोप में गिरफ्तार दो कानून के छात्रों को अदालत ने जमानत दे दी है।
अदालत ने कहा कि आरोपितों का व्यवहार किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है और इसकी कड़ी निंदा की जाती है। हालांकि, केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर किसी व्यक्ति को अनिश्चित समय तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
पटियाला हाउस स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट रवि ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्था किसी एक आक्रोशित और खुद पैरवी करने वाले वादी के असंयमित व्यवहार से कमजोर नहीं होती।
अधीनस्थ अदालतों को भी संयम का पालन करना चाहिए
अदालत ने कहा कि जमानत पर फैसला लेते समय अधीनस्थ अदालतों को भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिखाए गए संस्थागत संयम को ध्यान में रखना चाहिए।
अदालत ने उत्तर प्रदेश के इटावा निवासी और लखनऊ विश्वविद्यालय के तृतीय वर्ष के कानून छात्र प्रबल प्रताप सिंह तथा रायबरेली निवासी द्वितीय वर्ष के छात्र चंदर भान की जमानत याचिकाएं स्वीकार कर लीं।
दोनों छात्रों को 25-25 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया।
10 जुलाई की घटना को लेकर दर्ज हुआ था मामला
दिल्ली पुलिस के अनुसार, 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर-13 में विशेष अनुमति याचिका की सुनवाई के दौरान प्रबल प्रताप सिंह खुद याचिकाकर्ता के रूप में पेश हुए थे।
आरोप है कि सुनवाई के दौरान उन्होंने अभद्र और असंसदीय भाषा का प्रयोग किया, कोर्ट रूम में कागजात फेंके, हंगामा किया और सुरक्षा कर्मी के साथ बल प्रयोग किया। इस मामले में चंदर भान को भी सह-आरोपित बनाया गया है।
अभद्र भाषा का इस्तेमाल किसी को भी मंजूर नहीं
अदालत ने कहा कि कोई भी पक्षकार, चाहे वह किसी फैसले से कितना भी असंतुष्ट हो या खुद अपनी पैरवी कर रहा हो, उसे अदालत में अभद्र भाषा का प्रयोग करने या मुख्य न्यायाधीश के पद की गरिमा पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह का व्यवहार किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई की घटना पर संयम दिखाते हुए तत्काल कार्रवाई का प्रस्ताव नहीं रखा था। इसलिए जमानत के मामले में भी संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
जांच पूरी होने के बाद नहीं थी हिरासत की जरूरत
अदालत ने कहा कि आरोपितों के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है और पुलिस को अब उनकी हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है। जिन धाराओं में मामला दर्ज किया गया है, उनमें अधिकतम दो वर्ष तक की सजा का प्रावधान है।
अदालत ने यह भी माना कि दोनों आरोपितों के स्थायी पते सत्यापित हैं और उनके फरार होने, साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने या गवाहों को प्रभावित करने की कोई संभावना नहीं दिखती। ऐसे में उनकी लगातार हिरासत उचित नहीं है।
जमानत के साथ रखी गई शर्तें
अदालत ने जमानत देते हुए निर्देश दिया कि दोनों आरोपित जांच और ट्रायल के दौरान जरूरत पड़ने पर अदालत में उपस्थित होंगे। साथ ही भविष्य की सभी न्यायिक कार्यवाहियों में शालीनता बनाए रखेंगे और अदालत की गरिमा का सम्मान करेंगे।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत के मुद्दे तक सीमित हैं और मुकदमे के अंतिम फैसले को प्रभावित नहीं करेंगी।
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