पहले तय होगा पार्टी में हुआ था विभाजन या नहीं, शिवसेना विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

HIGHLIGHTS
- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ कर रही सुनवाई
- उद्धव ठाकरे गुट की ओर से कपिल सिब्बल ने दलीलें रखीं
- शिंदे गुट के 11 राज्य प्रभारियों के समर्थन का मुद्दा भी उठा
मुंबई। शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर जारी कानूनी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अहम टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि सबसे पहले यह तय करना होगा कि शिवसेना में वास्तव में विभाजन हुआ था या नहीं। अदालत ने कहा कि यह विभाजन विधायक दल से शुरू होकर पार्टी संगठन और प्राथमिक सदस्यों तक भी पहुंच सकता है। मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।
क्या विधायक दल में बंटवारा ही पार्टी में विभाजन का आधार हो सकता है?
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि विभाजन की शुरुआत विधायक दल से हो सकती है, लेकिन उसका प्रभाव पार्टी संगठन और प्राथमिक सदस्यों तक भी पहुंच सकता है। उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि केवल विधायक दल में विभाजन को राजनीतिक दल में विभाजन नहीं माना जा सकता। इस संबंध में उन्होंने संविधान पीठ के फैसले का भी हवाला दिया।
क्या शिंदे गुट का संगठन में समर्थन भी देखा जाएगा?
पीठ ने कहा कि शिंदे गुट को 11 ‘राज्य प्रभारियों’ का समर्थन हासिल था और राज्य प्रभारी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे का हिस्सा होते हैं। अदालत ने कहा कि किसी राजनीतिक दल का आकलन केवल पदाधिकारियों के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि प्राथमिक सदस्यों को भी ध्यान में रखना होगा।
इस दौरान पीठ ने कहा कि इस पहलू पर स्पष्टता जरूरी है कि यदि विधायक दल से शुरू हुआ विभाजन बाद में पार्टी के व्यापक संगठन में भी दिखाई देने लगे, तो क्या चुनाव आयोग के सामने विवाद का फैसला करते समय इसे ध्यान में रखा जा सकता है।
क्या चुनाव आयोग ने पार्टी विवाद तय करने में सही प्रक्रिया अपनाई?
कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि आयोग ने यह तय करने के लिए किस तरीके का इस्तेमाल किया कि पार्टी के भीतर वास्तविक विवाद था या नहीं और आयोग के पास पहुंचे गुट ने शिवसेना के संविधान में उपलब्ध आंतरिक उपायों का इस्तेमाल किया था या नहीं।
उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और पार्टी प्रमुख की शक्तियों को लेकर आयोग के आकलन को भी चुनौती दी। सिब्बल ने कहा कि पार्टी के संविधान, उसके तहत हुए चुनावों या नियुक्तियों की वैधता को लेकर आयोग के सामने कोई विवाद नहीं था।
क्या चुनाव आयोग ने संगठन के बजाय विधायकों की संख्या को ज्यादा महत्व दिया?
सिब्बल ने आरोप लगाया कि आयोग ने शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे को अलग रखते हुए आखिरकार विधायक दल के बहुमत के आधार पर चुनाव चिह्न विवाद का फैसला किया। उन्होंने पैराग्राफ 15 के तहत आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाया।
उनके मुताबिक, आयोग को इस प्रावधान के तहत तभी अधिकार मिलता है, जब उसके सामने मामला आने के समय राजनीतिक दल में विभाजन मौजूद हो।
क्या मुख्यमंत्री बनने के बाद शिंदे के समर्थन को आधार बनाया जा सकता है?
सिब्बल ने यह भी दलील दी कि एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके साथ अधिक लोगों का जुड़ना उनके गुट की वास्तविक ताकत का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पद मिलने के बाद पार्टी के लोग स्वाभाविक रूप से पद पर बैठे व्यक्ति की ओर जा सकते हैं।
इसलिए बाद में उनके साथ जुड़े सदस्यों की संख्या के आधार पर पहले के संगठनात्मक समर्थन का आकलन नहीं किया जाना चाहिए।
क्या सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के फैसले की कसौटी तय करेगा?
पीठ ने कहा कि यदि चुनाव आयोग के पास प्रथम दृष्टया अधिकार था, लेकिन उसने उसका गलत इस्तेमाल किया या स्थापित सिद्धांतों के विपरीत प्रक्रिया अपनाई, तो स्थिति अलग होगी। वहीं, अगर आयोग के पास अधिकार ही नहीं था, तो मामला अलग होगा।
सुप्रीम कोर्ट उद्धव ठाकरे गुट की उन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई कर रहा है, जिनमें चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट को मूल शिवसेना माना गया था और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया था।
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