UPI पर 0.4% शुल्क को लेकर शिवसेना (UBT) का केंद्र पर हमला, 'सामना' में सरकार को घेरा

HIGHLIGHTS
- पार्टी ने शुल्क का असर ग्राहकों तक पहुंचने की आशंका जताई।
- 'सामना' ने वीजा और मास्टरकार्ड जैसी कंपनियों का जिक्र किया।
- संपादकीय में अमेरिकी दबाव को लेकर प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाए गए।
शिवसेना (यूबीटी) ने शनिवार को यूपीआई लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाए जाने के फैसले को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित संपादकीय में 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने के फैसले को 'शब्दों का खेल' बताया गया। पार्टी ने सरकार के उस दावे को भी खारिज किया कि इस शुल्क का असर केवल व्यापारियों पर पड़ेगा और आम लोगों पर इसका कोई बोझ नहीं आएगा।
संपादकीय में कहा गया कि जिस तरह ईंधन पर उत्पाद शुल्क और जीएसटी का अंतिम भार ग्राहकों तक पहुंचता है, उसी तरह व्यापारी भी इस अतिरिक्त खर्च का बोझ खरीदारों पर डाल सकते हैं। 'सामना' ने आरोप लगाया कि भारत का डिजिटल लेन-देन ढांचा वीजा और मास्टरकार्ड जैसी बड़ी अमेरिकी कंपनियों के हाथों में सौंपा जा रहा है। इसे भारत के मध्यम वर्ग और छोटे खुदरा व्यापारियों की कीमत पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए की जाने वाली परोक्ष वसूली बताया गया है।
उद्धव ठाकरे गुट ने घरेलू फैसलों को विदेश नीति से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अमेरिकी दबाव के आगे बार-बार झुकने का आरोप लगाया। संपादकीय में ईरान से कच्चे तेल की खरीद रोकने, अमेरिकी व्यापार शुल्क और ट्रंप प्रशासन की कूटनीतिक मांगों के आगे झुकने का उदाहरण देते हुए विदेश नीति को कमजोर बताया गया।
संपादकीय में लिखा गया है, "यूपीआई पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने का फैसला केवल अमेरिकी फिनटेक कंपनियों को खुश करने के लिए किया गया है। इस बात की जांच होनी चाहिए कि इन कंपनियों से भारतीय नेताओं और उनके बच्चों को रोजाना कितने हजार करोड़ रुपये मिलेगा। इससे साफ है कि अमेरिका को मिलने वाली इस वसूली में भारतीय दलालों का भी हिस्सा होगा। यह राष्ट्रसेवा का नया रूप है, जिसके लिए देश के आम नागरिकों और छोटे व्यापारियों की बलि चढ़ा दी गई है।"
'सामना' के संपादकीय में केंद्र सरकार की 'विश्वगुरु' वाली छवि को भी बनावटी और कमजोर बताया गया। इसमें कहा गया कि सरकार सिंगापुर, यूएई, मॉरीशस और श्रीलंका में यूपीआई के इस्तेमाल का जश्न मनाती है, लेकिन अपने ही देश के लोगों पर शुल्क का बोझ बढ़ा रही है।
पार्टी ने कहा कि सरकार कैशलेस अर्थव्यवस्था की बात करती है, लेकिन नोटबंदी, जीएसटी, महंगाई और अब ट्रांजैक्शन टैक्स के जरिए कामकाजी वर्ग का खून चूस रही है। संपादकीय में आरोप लगाया गया कि डिजिटल क्रांति के नाम पर आम जनता से हजारों करोड़ रुपये वसूल किए जा रहे हैं और इसका फायदा कॉरपोरेट तथा विदेशी बिचौलियों को पहुंचाया जा रहा है।
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