चिन्मय प्रभु के दर्द से जुड़ी शुभेंदु अधिकारी की कहानी, मां के पलायन का किया जिक्र

HIGHLIGHTS
- चिन्मय प्रभु को मां के अंतिम दर्शन के लिए सीमित समय की पैरोल मिली थी।
- शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल विभाजन और हिंदू परिवारों के विस्थापन का मुद्दा उठाया।
- मुख्यमंत्री ने धार्मिक परंपराओं को बनाए रखने और सामाजिक एकता की अपील की।
कोलकाता। बांग्लादेश में करीब दो साल से जेल में बंद चिन्मय प्रभु को मां के अंतिम संस्कार के लिए सिर्फ पांच घंटे की पैरोल मिलने और अंतिम दर्शन के दौरान उनकी आंखों से आंसू निकलने का जिक्र करते हुए बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपने परिवार के विस्थापन की पीड़ा भी साझा की।
कोलकाता के केष्टोपुर में गणेश पूजा के उद्घाटन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने कहा कि हिंदू होने के कारण उनकी मां को भी अपने पिता का हाथ पकड़कर एक कपड़े में भारत आना पड़ा था। उन्होंने कहा कि चिन्मय प्रभु के साथ हुई घटना ने सनातनियों के दिल को झकझोर दिया है।
शुभेंदु अधिकारी ने बंगाली हिंदुओं की सुरक्षा और उनके लिए अलग मातृभूमि के निर्माण में भारत केसरी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और भारत सेवाश्रम संघ के संस्थापक स्वामी प्रणवानंद की भूमिका का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि अगर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और स्वामी प्रणवानंद के प्रयासों के चलते बंगाल का भारत में विलय नहीं हुआ होता, तो आज बंगाली हिंदुओं की स्थिति भी चिन्मय प्रभु जैसी हो सकती थी।
बंगाल विभाजन को बताया भयावह त्रासदी
शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि बंगाल का विभाजन एक भयावह त्रासदी थी, जिसका अविभाजित बंगाल के लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाया कि पिछले 15 वर्षों में बंगाल को ग्रेटर बांग्लादेश बनाने की कोशिश की गई।
उन्होंने कहा कि उनकी सरकार बंगाली हिंदुओं की संस्कृति, परंपरा और विरासत को दोबारा स्थापित करना चाहती है।
मां के भारत आने की कहानी साझा की
मुख्यमंत्री ने अपने परिवार के विस्थापन का जिक्र करते हुए बताया कि उनकी मां गायत्री देवी मूल रूप से पूर्वी बंगाल, जो अब बांग्लादेश है, की रहने वाली थीं। उनके मुताबिक, देश के विभाजन के दौरान धार्मिक कट्टरपंथियों के अत्याचार के कारण उनके नाना को परिवार के साथ भारत आना पड़ा था।
शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि हिंदू होने के कारण उनकी मां को भी अपने पिता के साथ एक कपड़े में वहां से पलायन करना पड़ा था।
चिन्मय प्रभु की मां के निधन के बाद उन्हें कुछ घंटों के लिए पैरोल मिलने और अंतिम दर्शन के दौरान उनके भावुक होने का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह दृश्य सनातन समाज के लिए बेहद पीड़ादायक था।
उन्होंने बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर चिंता जताई और कहा कि ऐसे घटनाक्रम देश विभाजन के समय हिंदू परिवारों द्वारा झेली गई पीड़ा की याद फिर ताजा कर देते हैं।
पितृपक्ष में दुर्गापूजा के उद्घाटन को लेकर तृणमूल पर निशाना
मुख्यमंत्री ने बंगाल में पिछले कुछ वर्षों से पितृपक्ष के दौरान दुर्गापूजा के उद्घाटन की परंपरा को लेकर भी पूर्ववर्ती तृणमूल सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि बंगाल की सनातनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में बदलाव करने की कोशिश की गई।
उन्होंने कहा कि अब दुर्गापूजा का उद्घाटन पितृपक्ष में नहीं, बल्कि देवपक्ष यानी महालय के दिन से ही किया जाएगा। साथ ही महाष्टमी की पवित्रता बनाए रखने के लिए उस दिन शराब की बिक्री पूरी तरह बंद रखने का निर्देश दिया।
शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि पितृपक्ष में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। इस दौरान गया में पिंडदान और श्राद्ध जैसे धार्मिक कार्य किए जाते हैं और इस अवधि में शुभ कार्य नहीं किए जाते।
उन्होंने आरोप लगाया कि जेल में बंद एक पूर्व मंत्री सुजीत बोस और तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कार्यकाल में पितृपक्ष के दौरान ही दुर्गापूजा के उद्घाटन की परंपरा शुरू हुई। उनके अनुसार, यह बंगाल की परंपरा के अनुरूप नहीं है।
मुख्यमंत्री ने महाष्टमी के दिन शराब की बिक्री पर रोक के साथ श्रद्धालुओं से शुद्ध वस्त्र पहनकर मां दुर्गा की अंजलि देने की पुरानी परंपरा को वापस लाने की अपील की।
उन्होंने 34 वर्षों के वाम शासन और उसके बाद के 15 वर्षों के तृणमूल शासन का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि पंचांग, शास्त्र, पुरोहित और मंत्रोच्चार जैसी परंपराओं को भुलाने का प्रयास किया गया। उन्होंने दशमी के दिन मुहर्रम के कारण दुर्गा प्रतिमा विसर्जन रोकने की कोशिश को लेकर भी पूर्ववर्ती सरकार की आलोचना की।
भाषा और जाति के नाम पर विभाजन से बचने की अपील
मुख्यमंत्री ने भाषा और क्षेत्र के आधार पर होने वाली विभाजन की राजनीति का भी विरोध किया। उन्होंने कहा कि पहले गणेश पूजा और दुर्गापूजा को किसी खास राज्य या शहर तक सीमित रखने की मानसिकता थी, लेकिन अब लखनऊ, पटना और पुणे समेत देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़े स्तर पर दुर्गापूजा आयोजित की जा रही है।
उन्होंने बंगाली, हिंदीभाषी, गुजराती और मारवाड़ी समाज के बीच बनी कृत्रिम दीवारों को खत्म करने की अपील की। शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि भाषा और जाति के नाम पर विभाजन नहीं होना चाहिए। उन्होंने बंगाल को सभी की साझा विरासत बताते हुए इसकी रक्षा की जिम्मेदारी भी सभी की बताई।
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