कर्नाटक के किसानों को सुप्रीम कोर्ट से राहत, जमीन का मुआवजा 5 लाख से बढ़ाकर 6.5 लाख रुपये प्रति एकड़ किया

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया।
- किसानों को पहले तय 5 लाख रुपये के बजाय 6.5 लाख रुपये प्रति एकड़ मुआवजा मिलेगा।
- 4427 दिनों की देरी के कारण इस अवधि के लिए किसानों को ब्याज नहीं मिलेगा।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एक ही अधिसूचना के तहत अधिग्रहित की गई जमीन के लिए मुआवजे की दर में समानता होनी चाहिए। इसी आधार पर शीर्ष अदालत ने कर्नाटक के भूस्वामी किसानों को राहत देते हुए संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया और उनका मुआवजा बढ़ाने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील करने वाले किसानों को वही मुआवजा देने का निर्देश दिया, जो उसी अधिसूचना के तहत अधिग्रहित जमीन से जुड़े अन्य मामलों में पहले ही तय किया जा चुका है।
अनुच्छेद-142 के तहत बढ़ाया मुआवजा
जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सात अगस्त को कर्नाटक के भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामले में फैसला सुनाया। पीठ ने कहा कि संबंधित अधिसूचना से जुड़े मामलों में वैधानिक लाभों समेत मुआवजे की दर 6.5 लाख रुपये प्रति एकड़ निर्धारित की जा चुकी है।
ऐसे में यही दर अपील करने वाले किसानों पर भी लागू होनी चाहिए। किसानों की ओर से अपील दाखिल करने में काफी देरी के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए मुआवजा पांच लाख रुपये प्रति एकड़ से बढ़ाकर 6.5 लाख रुपये प्रति एकड़ करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे किसान
मामला 11 फरवरी 1999 को जारी अधिसूचना से संबंधित है। इसके तहत कर्नाटक के बागलकोट जिले में जमीन का अधिग्रहण किया गया था। भूमि अधिग्रहण अधिकारी के अवार्ड के बाद संदर्भ न्यायालय ने वर्ष 2001 में मुआवजे की राशि तीन लाख रुपये प्रति एकड़ तय की थी।
इससे असंतुष्ट किसानों ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने मुआवजा बढ़ाकर पांच लाख रुपये प्रति एकड़ कर दिया। इसके बाद किसानों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की और उसी अधिसूचना के तहत अधिग्रहित अन्य जमीनों के लिए पहले तय किए गए 6.5 लाख रुपये प्रति एकड़ के मुआवजे के समान राशि देने की मांग की।
भूमि अधिग्रहण अथॉरिटी और राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि किसानों ने अपील दाखिल करने में बहुत अधिक देरी की है। हाईकोर्ट ने भी इस देरी को असामान्य माना था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड में पाया कि इसी अधिसूचना से जुड़े अन्य मामलों में 6.5 लाख रुपये प्रति एकड़ का मुआवजा निर्धारित किया गया था और शीर्ष अदालत ने भी उस राशि को बरकरार रखा था।
4427 दिन की देरी, इस अवधि का ब्याज नहीं मिलेगा
किसानों ने इसी आधार पर समान मुआवजे की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब समान अधिसूचना के तहत आने वाले मामलों में 6.5 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर पहले ही लागू हो चुकी है, तो इसे इन अपीलकर्ताओं पर भी लागू किया जा सकता है।
हालांकि, हाईकोर्ट में अपील दाखिल करने में 2383 दिन और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल करने में 2044 दिन की देरी हुई। कुल 4427 दिनों की देरी को देखते हुए इस अवधि के लिए किसानों को ब्याज नहीं दिया जाएगा।
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