भारत-यूरोप व्यापार समझौते से नई उम्मीदें, पीयूष गोयल का दौरा अहम

HIGHLIGHTS
- भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते को लेकर तैयारियां तेज।
- जर्मनी में भारतीय कुशल कामगारों की मांग में उल्लेखनीय बढ़ोतरी।
- जर्मनी ने भारतीयों के लिए कुशल कामगार वीजा कोटा बढ़ाकर 90 हजार किया।
अमेरिका के अप्रत्याशित व्यापारिक रुख के बीच केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल का जर्मनी और नीदरलैंड का छह दिवसीय दौरा भारत और यूरोप के बीच आर्थिक संबंधों की अहमियत को रेखांकित करता है। इस दौरे से स्पष्ट हुआ कि दोनों पक्षों के बीच संबंध अब केवल एक-दूसरे की जरूरतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समान हितों और साझा संभावनाओं पर आधारित हैं।
भारत को यूरोप की तकनीक और बाजार की जरूरत है, वहीं धीमी आर्थिक वृद्धि, बढ़ती लागत और बूढ़ी होती आबादी जैसी चुनौतियों से जूझ रहे यूरोप को भी भारत की विकास गति से उम्मीदें हैं। जर्मनी और नीदरलैंड में हुई चर्चाओं में भारत के साथ आर्थिक साझेदारी को भविष्य के अवसरों से जोड़कर देखा गया। भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर से करीब 60 दिन पहले हुए इस दौरे का उद्देश्य उन संभावनाओं को आगे बढ़ाना था, ताकि समझौते में मिलने वाली रियायतों का लाभ कारोबार, उत्पादन और ऑर्डर तक पहुंच सके।
यूरोप को भारत की जरूरत क्यों है?
आर्थिक विकास के आंकड़े भारत और यूरोप के बीच अंतर को दिखाते हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने जुलाई में यूरो क्षेत्र की 2026 की विकास दर 0.9 फीसदी और जर्मनी की 0.7 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था। वहीं, डॉयचे बैंक ने यूरो क्षेत्र और जर्मनी, दोनों की विकास दर का अनुमान घटाकर 0.5 फीसदी कर दिया। इसके मुकाबले पीयूष गोयल ने भरोसा जताया कि भारत इस साल 7.5 फीसदी की दर से विकास करेगा।
यूरोप की चुनौती केवल आर्थिक रफ्तार तक सीमित नहीं है। जर्मनी को कामगारों की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है। एक अध्ययन के मुताबिक, देश को हर साल कम से कम 2,88,000 विदेशी कामगारों की जरूरत है। ऐसा नहीं होने पर 2040 तक उसका कार्यबल 10 फीसदी तक घट सकता है।
इसी जरूरत को देखते हुए जर्मनी ने भारतीय कुशल कामगारों के वीजा का सालाना कोटा 20,000 से बढ़ाकर 90,000 कर दिया है। जर्मनी में काम करने वाले भारतीयों की संख्या भी 2015 के 23,320 से बढ़कर 2024 में 1,36,670 हो गई।
बर्लिन में गोयल ने कहा कि जर्मनी 2022 के आवाजाही समझौते के तहत भारत से कामगारों को बुलाना चाहता है। वहां नर्सों, देखभालकर्ताओं और आईटीआई से प्रशिक्षित युवाओं की काफी मांग है।
यूरोप के कारोबारी भी भारत के साथ साझेदारी के पक्ष में
भारत के साथ व्यापार बढ़ाने की जरूरत केवल भारतीय पक्ष की ओर से नहीं जताई जा रही है। हेग में डच कारोबारी जगत के एक प्रतिनिधि ने माना कि भारत ऐसे बड़े अवसर उपलब्ध कराता है, जिनकी मिसाल दुनिया में मिलना मुश्किल है।
रॉटरडैम बंदरगाह के प्रमुख बौदेविन सीमन्स ने भी कहा कि यूरोप भारत के साथ अधिक से अधिक व्यापार करना चाहता है।
नीदरलैंड के विदेश व्यापार मंत्री शूर्ड शूर्डस्मा ने भारत और यूरोप के संबंधों को लेकर सकारात्मक रुख जताया। उन्होंने कहा कि दुनिया की मौजूदा स्थिति को देखकर उम्मीद की ज्यादा वजहें नहीं दिख सकतीं, लेकिन यूरोप-भारत और नीदरलैंड-भारत के रिश्तों में उम्मीद की कई संभावनाएं हैं।
असली चुनौती अब समझौते को जमीन पर उतारने की
पीयूष गोयल के दौरे से भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक सहयोग को लेकर माहौल बना है, लेकिन अब असली चुनौती इन संभावनाओं को वास्तविक कारोबार में बदलने की है।
पहली चुनौती समय की है। अगले साल की शुरुआत में समझौता लागू होने तक भारतीय कारोबारियों को अपने उत्पादों के नमूने, गुणवत्ता और कीमतें तय करनी होंगी, ताकि वे नए अवसरों का लाभ उठा सकें।
दूसरी बड़ी चुनौती कार्बन कर है। यूरोप इस मुद्दे पर रियायत देने को तैयार नहीं है। ऐसे में भारतीय स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट उद्योगों को अपने कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के प्रयास तेज करने होंगे।
तीसरी चुनौती दोनों पक्षों में मौजूद लालफीताशाही है। दोनों ओर के मंत्रियों ने भी इसे एक समस्या के रूप में स्वीकार किया है।
चौथी कसौटी प्रतिभा और कुशल कामगारों के संतुलन से जुड़ी है। जर्मनी को भारतीय कामगारों की जरूरत है, लेकिन गोयल पहले ही कह चुके हैं कि भारत के सामने अपने लोगों को वापस देश लाने की चुनौती भी है। युवा शोधकर्ताओं ने उनसे कहा कि भारत लौटने के लिए केवल आर्थिक प्रोत्साहन पर्याप्त नहीं है, बल्कि बेहतर माहौल भी जरूरी है।
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