देश में सिर्फ 3% ट्रक, लेकिन सड़क प्रदूषण का आधे से ज्यादा हिस्सा इन्हीं से: रिपोर्ट

भारत में हर साल अरबों टन माल एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है। इस विशाल ढुलाई को फ्रेट ट्रांसपोर्ट कहा जाता है, और इसके संचालन की रीढ़ हैं देश की सड़कें और उन पर दौड़ते ट्रक। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि सड़क पर मौजूद कुल वाहनों में ट्रकों का हिस्सा मात्र 3 प्रतिशत है, जबकि सड़क परिवहन से निकलने वाले प्रदूषण का आधा से ज्यादा इसी छोटे हिस्से के कारण है।
ट्रक उत्सर्जन का असली पैमाना
आंकड़े बताते हैं कि भारी वाहन और ट्रक:
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53% पार्टिकुलेट मैटर (PM)
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60% से अधिक ब्लैक कार्बन
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70% से अधिक नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx)
उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। अनुमान है कि 2030-31 तक मीडियम और हेवी ड्यूटी वाहनों का योगदान कुल सड़क उत्सर्जन में 27% से बढ़कर 35% हो जाएगा, जबकि फ्रेट की मांग तीन गुना तक बढ़ने की उम्मीद है।
ट्रक प्रदूषण क्यों बढ़ा?
तीन मुख्य कारण हैं: ईंधन, उम्र और संचालन का पैमाना। अधिकांश भारी ट्रक डीजल पर चलते हैं, जिनमें से कई 10 साल से पुराने हैं। पुराने डीजल ट्रक ब्लैक कार्बन और पार्टिकुलेट मैटर के सबसे बड़े स्रोत हैं। खासकर नेशनल और स्टेट हाईवे के आसपास ये ट्रक ऐसे प्रदूषण हॉटस्पॉट बनाते हैं, जो शहरों की औसत एयर क्वालिटी आंकड़ों में अक्सर दिखाई नहीं देते।
सही तरीके से माप नहीं हो रहा उत्सर्जन
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उत्सर्जन का आंकलन व्यवस्थित रूप से नहीं हो रहा। SEBI के BRSR फ्रेमवर्क के तहत 800 कंपनियों में से केवल 7% कंपनियां ही फ्रेट उत्सर्जन की रिपोर्टिंग करती हैं। और जो रिपोर्ट करती हैं, उनके आंकड़े अलग-अलग तरीके से तैयार किए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, एक सीमेंट कंपनी के उत्सर्जन का अनुमान 2.65 लाख टन से 30 लाख टन CO₂ तक निकला।
समाधान: एक समान माप प्रणाली
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि भारत ISO 14083 मानक को अपनाकर फ्रेट उत्सर्जन माप प्रणाली को एकरूप बनाए। इससे:
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कंपनियां सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले रूट्स पहचान पाएंगी
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सरकार सही जगह पर कार्रवाई कर सकेगी
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कार्बन क्रेडिट स्कीम के जरिए सुधार को आर्थिक लाभ में बदला जा सकेगा
अगर कदम नहीं उठाए गए तो नुकसान
समस्या सिर्फ हवा की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। यूरोपीय यूनियन का कार्बन बॉर्डर टैक्स लागू हो चुका है। यदि भारतीय निर्यातक अपने माल और ढुलाई के कार्बन उत्सर्जन को प्रमाणित नहीं कर पाए, तो उन्हें भारी जुर्माना देना होगा। इससे भारत की अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य क्षेत्र और फ्रेट कॉरिडोर के आस-पास रहने वाले लोगों की सेहत पर असर पड़ेगा।
उम्मीद की किरण
अच्छी खबर यह है कि समस्या हल की जा सकती है। डेटा मौजूद है, वैश्विक मानक उपलब्ध हैं और अब भारत के पास स्थानीय रोडमैप भी है। अगर सिर्फ 3% वाहनों पर लक्षित कार्रवाई की जाए, तो प्रदूषण में disproportionate सुधार संभव है। यही वह अवसर है, जो भारत को साफ हवा और मजबूत अर्थव्यवस्था दोनों दिला सकता है।
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