सपा विधायक मोहम्मद फहीम और उनके चाचा समेत चार लोगों के जाति प्रमाणपत्र निरस्त

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के बिलारी से समाजवादी पार्टी के विधायक मोहम्मद फहीम को लेकर बड़ा प्रशासनिक फैसला सामने आया है। जिला स्तरीय जाति प्रमाणपत्र सत्यापन समिति ने उनकी जाति प्रमाणपत्र को फर्जी मानते हुए निरस्त कर दिया है। विधायक फहीम ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के तहत झोजा जाति का प्रमाणपत्र बनवाया था, लेकिन जांच में उनका झोजा जाति से संबंधित होना स्पष्ट नहीं पाया गया।
समिति ने विधायक के साथ-साथ उनके चाचा हाजी मोहम्मद उस्मान और उस्मान की दो बेटियों फरहीन जहां व समरीन जहां के जाति प्रमाणपत्र भी रद्द कर दिए हैं। समिति का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित नहीं हो सका कि ये सभी झोजा जाति में आते हैं।
शिकायत के बाद शुरू हुई जांच
इस पूरे मामले की शुरुआत बिलारी तहसील के ग्राम सिहाली निवासी विश्वास यादव उर्फ लवली यादव की शिकायत से हुई थी। उन्होंने 19 जुलाई 2024 को जनपद स्तरीय समिति के समक्ष वाद दायर कर आरोप लगाया था कि विधायक फहीम और उनके परिजनों के जाति प्रमाणपत्र वास्तविक नहीं हैं। शिकायत के आधार पर चार सदस्यीय समिति ने मामले की सुनवाई शुरू की।
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं और प्रस्तुत दस्तावेजों की गहन जांच की गई। समिति ने निष्कर्ष निकाला कि विधायक फहीम का अन्य पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत झोजा जाति में वर्गीकरण प्रमाणित नहीं हो पा रहा है, इसलिए उन्हें इस श्रेणी का लाभ नहीं दिया जा सकता।
पिछड़ा वर्ग आयोग के पुराने फैसले का हवाला
समिति ने अपने आदेश में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के एक पुराने निर्णय का भी उल्लेख किया। आयोग के समक्ष वर्ष 1997 में झोजा और तुर्क को समानार्थक जाति मानने की मांग रखी गई थी, जिसे 24 मार्च 1998 को तथ्यों के आधार पर खारिज कर दिया गया था। आयोग ने स्पष्ट किया था कि तुर्क और झोजा अलग-अलग जातियां हैं और केंद्रीय ओबीसी सूची में केवल झोजा को ही शामिल किया गया है। इसी आधार पर वर्तमान मामले में भी निर्णय लिया गया।
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया
मामले पर जिलाधिकारी अनुज सिंह ने बताया कि सभी पक्षों को सुनने और अभिलेखीय साक्ष्यों की समीक्षा के बाद समिति ने यह निर्णय लिया है, जिसके तहत विधायक मोहम्मद फहीम का जाति प्रमाणपत्र निरस्त किया गया है।
वहीं, विधायक मोहम्मद फहीम ने कहा कि उन्हें फिलहाल इस निर्णय की आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है। विधानसभा सत्र के चलते वह लखनऊ में हैं और लौटने के बाद आवश्यकता पड़ने पर जिलाधिकारी से मिलकर स्थिति स्पष्ट करेंगे।
इधर, विधायक के चाचा हाजी मोहम्मद उस्मान ने समिति के फैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा कि उनके पास वर्ष 1911 से 2018 तक के पुश्तैनी और ठोस दस्तावेज मौजूद हैं, जिन्हें समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया था। उनका कहना है कि यदि इन साक्ष्यों को नजरअंदाज कर आदेश पारित किया गया है तो वे मंडलीय अपीलीय फोरम में कानूनी अपील करेंगे और उन्हें वहां से न्याय मिलने की पूरी उम्मीद है।
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