दिल्ली हाईकोर्ट ने विवाह को बताया विरोधाभासी, कहा- ‘बेहतर आधा’ बन सकता है ‘कड़वाहट भरा आधा’

HIGHLIGHTS
- दिल्ली हाईकोर्ट ने विवाह संस्था पर की टिप्पणी
- समय रहते वैवाहिक विवाद सुलझाने की कही बात
- नाफे सिंह को हत्या के प्रयास के मामले में किया बरी
दिल्ली उच्च न्यायालय ने विवाह की संस्था को विरोधाभासी बताते हुए कहा है कि अगर पति-पत्नी के बीच के मुद्दों का समय रहते समाधान नहीं किया जाता है, तो ‘बेहतर आधा’ (better half) ‘कड़वाहट भरा आधा’ (bitter half) बन जाता है। न्यायालय ने कहा कि मानव संबंधों में सबसे खूबसूरत पति-पत्नी का रिश्ता तब सबसे भयानक रूप ले लेता है, जब वैवाहिक गठबंधन में चीजें गलत होने लगती हैं।
न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव ने यह टिप्पणी एक व्यक्ति की अपील स्वीकार करते हुए की। उसे निचली अदालत ने अपनी पत्नी के मुंह में कीटनाशक डालकर उसकी हत्या के प्रयास के मामले में तीन साल कैद की सजा सुनाई थी। उच्च न्यायालय ने नाफे सिंह को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष के मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 307 के तहत इरादे और ज्ञान को लेकर कोई ठोस सबूत नहीं था।
अदालत ने कहा कि विवाह की संस्था विरोधाभासी और चरमताओं का संसार है। यदि इसे सावधानी से नहीं संभाला जाए तो सबसे अच्छा रिश्ता पल भर में सबसे खराब हो सकता है। अगर मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया जाता और उनका जल्द समाधान नहीं किया जाता, तो बेहतर आधा कड़वाहट भरा आधा बन जाता है।
न्यायालय ने कहा कि समय भले ही बड़ा मरहम हो और जीवन के कई दर्द को कम करता हो, लेकिन रिश्तों में लिया गया समय प्रति-उत्पादक भी हो सकता है। अदालत के अनुसार, अगर रिश्तों को सावधानीपूर्वक और समय रहते नहीं संभाला जाता है तो वे पूरी तरह अलग, अवांछित और अप्रत्याशित दिशा में जा सकते हैं।
विवाह विश्वास और भरोसे पर आधारित
उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि विवाह की संस्था विश्वास, साथ और एक-दूसरे के प्रति भरोसे पर आधारित होती है। पति-पत्नी के बीच इस बंधन में आने वाली परेशानियां केवल विवाह की संस्था को ही प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि परिवार और समाज पर भी असर डालती हैं।
अदालत ने कहा कि विश्वास और भरोसे पर आधारित रिश्ता संघर्ष क्षेत्र में बदल जाता है, जहां कई बार शारीरिक हिंसा भी सामने आती है। ऐसे में पति-पत्नी के बीच पैदा होने वाले विवादों का समय रहते समाधान करना जरूरी है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला नाफे सिंह और उनकी पत्नी से जुड़ा था। दोनों ने वर्ष 2000 में शादी की थी, लेकिन एक साल के भीतर ही उनके रिश्ते में खटास आ गई थी। अभियोजन के अनुसार, वर्ष 2001 में वैवाहिक विवाद के दौरान पति ने कथित तौर पर पहले अपनी पत्नी को कीटनाशक पिलाने की कोशिश की। इसमें असफल होने के बाद उसने सीधे कंटेनर से कीटनाशक उसके गले में डाल दिया।
मामले में एफआईआर दर्ज की गई थी और निचली अदालत ने नाफे सिंह को दोषी ठहराते हुए तीन साल कैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने अपील पर सुनवाई करते हुए अभियोजन के साक्ष्यों की जांच की और पाया कि धारा 307 के तहत हत्या के प्रयास के लिए जरूरी इरादे और ज्ञान साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस सबूत नहीं हैं। इसके बाद अदालत ने नाफे सिंह को बरी कर दिया।
Comments0
Leave a comment
Join the conversation — your email will not be published.






















Reader comments
No comments yet
Be the first to share your perspective on this story.