सामाजिक दबाव बन सकता है महिलाओं की मौत का कारण: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना से जुड़े एक गंभीर मामले में अहम फैसला सुनाते हुए पति को पत्नी की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी है। अदालत ने अपने फैसले में समाज में दहेज प्रथा और उससे जुड़ी मानसिकता पर भी कड़ी टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति पीके मिश्रा और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि क्या पीड़िता सोमा आचार्य की जान बचाई जा सकती थी, और क्या सामाजिक बदनामी के डर ने उसे एक खतरनाक स्थिति में धकेल दिया।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
अदालत ने कहा कि कई बार माता-पिता अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंता के बावजूद उन्हें बार-बार ससुराल भेज देते हैं, जिससे वे लगातार उत्पीड़न के बीच फंसी रहती हैं। कोर्ट ने इस मामले को समाज के लिए “चेतावनी” बताते हुए कहा कि ऐसी सोच कई बार महिलाओं को गंभीर खतरे में डाल देती है।
न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पीड़िता ने बार-बार अपने माता-पिता से मदद की गुहार लगाई थी और कुछ समय के लिए वह मायके भी आई थी, लेकिन हर बार सुलह कराकर उसे वापस ससुराल भेज दिया गया।
सामाजिक दबाव और गलत उम्मीदें
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में गांव-समाज के लोग और परिजन समझौते कर स्थिति सामान्य होने की उम्मीद करते हैं, लेकिन यह “झूठी आशा” अक्सर घातक साबित होती है। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के साथ भी यही हुआ, जहां अंततः उसका दुखद अंत हो गया।
मामले में क्या पाया गया?
रिकॉर्ड के अनुसार, शादी के लगभग 15 महीने बाद सोमा आचार्य का शव फंदे से लटका मिला था। पति ने इसे आत्महत्या बताया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल और अन्य सबूतों के आधार पर इस दावे को खारिज कर दिया।
अदालत ने पाया कि मृतका को दहेज में मोटरसाइकिल, टीवी और अन्य सामान की मांग को लेकर लगातार प्रताड़ित किया गया था। कुछ मांगें उसके माता-पिता ने पूरी भी की थीं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मृतका के शरीर पर पाए गए चोटों के निशान सामान्य आत्महत्या के मामलों से मेल नहीं खाते। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, मौत से पहले उसके साथ हिंसा के संकेत मिले, जिससे यह मामला “नकली फांसी” और दहेज हत्या का प्रतीक बनता है।
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