थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले का संकट, 50 संयंत्र क्रिटिकल श्रेणी में; सिर्फ 9 दिन का स्टॉक बाकी

HIGHLIGHTS
- देश के 50 पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक क्रिटिकल स्तर पर पहुंचा।
- इन संयंत्रों में निर्धारित आवश्यकता का सिर्फ 48 प्रतिशत कोयला उपलब्ध।
- मौजूदा स्टॉक करीब 9 दिनों की जरूरत के लिए पर्याप्त है।
नई दिल्ली। बिजली की बढ़ती मांग और मानसून के चलते आपूर्ति प्रभावित होने का असर देशभर के थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले के भंडार पर पड़ा है। इन संयंत्रों में कोयले का स्टॉक निर्धारित मानक के आधे से भी नीचे पहुंच गया है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के आंकड़ों के मुताबिक, 2 सितंबर तक देश के 50 पावर प्लांट्स में कोयले का भंडार क्रिटिकल यानी गंभीर स्तर पर पहुंच चुका था।
सीईए के आंकड़ों के अनुसार, करीब 224 गीगावाट की कुल क्षमता वाले इन संयंत्रों में बुधवार तक 28.2 मिलियन टन कोयला मौजूद था। यह 58.7 मिलियन टन की निर्धारित आवश्यकता का केवल 48 प्रतिशत है। 85 प्रतिशत प्लांट लोड फैक्टर पर यह स्टॉक करीब 9 दिनों की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में कम से कम 19 दिनों का बैकअप होना चाहिए।
संयंत्रों में 25 प्रतिशत से भी कम कोयला बचा
नियमों के मुताबिक, जिन पावर प्लांट्स में निर्धारित मानक के 25 प्रतिशत से कम कोयला उपलब्ध रहता है, उन्हें क्रिटिकल श्रेणी में रखा जाता है। कोयले की गंभीर कमी झेल रहे इन 50 संयंत्रों में 45 घरेलू कोयले पर, 4 आयातित कोयले पर और 1 संयंत्र कोयला धुलाई के अवशेष पर निर्भर है।
कोयला मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, सभी संवेदनशील संयंत्रों की निगरानी अंतर-मंत्रालयी टीम रोजाना कर रही है। इन प्लांट्स को लगातार कोयले की आपूर्ति भी की जा रही है।
मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सीईए के नियमों के तहत किसी संयंत्र को क्रिटिकल घोषित करना नियमित निगरानी प्रक्रिया का हिस्सा है। इसका उद्देश्य केवल ऐसे संयंत्रों पर लगातार नजर रखना और प्राथमिकता के आधार पर जरूरी कदम उठाना है। इन संयंत्रों में कोयले की आपूर्ति खत्म नहीं हो रही है।
बारिश से प्रभावित हुई आपूर्ति, मेंटेनेंस टालने के निर्देश
अधिकारियों के अनुसार, 85 प्रतिशत पीएलएफ पर चलने वाले संयंत्रों के लिए मानक कोयला आवश्यकता 3.1 मिलियन टन प्रतिदिन है, जबकि वास्तविक दैनिक खपत करीब 2.4 मिलियन टन है। हर साल मानसून के दौरान खदानों और परिवहन में आने वाली रुकावटों के कारण कोयले की सप्लाई प्रभावित होती है। हालांकि, सितंबर में बारिश कम होने के साथ स्थिति में सुधार होने लगता है।
इस मामले में विद्युत मंत्रालय की ओर से अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक बिजली उत्पादन में किसी तरह की रुकावट न हो, इसके लिए कुछ कोयला संयंत्रों को नियमित मेंटेनेंस आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।
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