आज की पीढ़ी सवाल पूछती है...बच्चों को प्यार, समय और तर्क के साथ समझाएं अभिभावक: मोहन भागवत

HIGHLIGHTS
- मोहन भागवत ने परिवार, संस्कार और नई पीढ़ी के साथ संवाद की जरूरत पर जोर दिया।
- उन्होंने बच्चों को समय, प्यार और तर्क के साथ समझाने की बात कही।
- RSS प्रमुख ने भारतीय संस्कृति और परंपराओं पर विश्वास बनाए रखने का आह्वान किया।
नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने दिल्ली में आयोजित 'विश्व मंगलम् सभा' को संबोधित करते हुए परिवार, संस्कार और नई पीढ़ी से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने 'युगानुकूल मातृत्व' कार्यक्रम के समापन सत्र में भी संबोधन दिया। यह दो दिवसीय कार्यक्रम 23 और 24 जुलाई को विश्वमंगल्य सभा की ओर से आयोजित किया गया था।
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि समय के साथ बच्चों की सोच और अपेक्षाओं में बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि आज के बच्चे केवल निर्देशों का पालन नहीं करते, बल्कि हर बात का कारण और तर्क जानना चाहते हैं। ऐसे में अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को पर्याप्त समय दें, स्नेह दें और उनके साथ लगातार संवाद बनाए रखें। अपने बचपन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय माता-पिता के प्रति पूर्ण विश्वास और श्रद्धा का भाव होता था।
उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी अधिक जिज्ञासु है और हर विषय को समझना चाहती है। ऐसे में परिवारों के भीतर संवाद का वातावरण बनाए रखना जरूरी है। मोहन भागवत ने कहा कि भारतीयों को बिना विचार किए पश्चिमी जीवनशैली अपनाने के बजाय अपनी संस्कृति और परंपराओं को महत्व देना चाहिए। उन्होंने मातृत्व को सृष्टि के निर्माण, पालन-पोषण और निरंतरता का मूल आधार बताया।
नई पीढ़ी के साथ संवाद पर जोर
मोहन भागवत ने कहा कि पहले के समय में बच्चे बड़ों की बात बिना सवाल किए मान लेते थे, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। उन्होंने कहा कि आज बच्चों के सवालों का धैर्यपूर्वक उत्तर देना और उन्हें तर्क के साथ समझाना आवश्यक है। उनके अनुसार, बच्चों को पर्याप्त समय देना और उनसे खुलकर बातचीत करना परिवार के रिश्तों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भारतीय संस्कृति और व्यक्तिवाद पर रखे विचार
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि औपनिवेशिक शासन के दौरान लोगों का अपनी परंपराओं पर विश्वास कमजोर हुआ और लंबे समय तक यह धारणा बनाई गई कि भारतीय परंपराएं गलत हैं। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक नींव मजबूत है और देश को अपने इतिहास, ज्ञान और परंपराओं पर विश्वास बनाए रखना चाहिए।
उन्होंने दुनिया में मातृत्व, विवाह और परिवार जैसी संस्थाओं पर उठ रहे सवालों का भी उल्लेख किया। भागवत ने इसे "अत्यधिक व्यक्तिवाद" की प्रवृत्ति बताया और कहा कि जिन समाजों ने इस सोच को अपनाया, वे अब स्वयं उस पर पुनर्विचार कर रहे हैं।
मोहन भागवत ने विज्ञान का जिक्र करते हुए कहा कि एक समय ऐसा माना जाता था कि विज्ञान हर प्रश्न का उत्तर दे सकता है, लेकिन अब स्वयं वैज्ञानिक भी उसकी सीमाओं को स्वीकार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत की परंपराएं व्यावहारिक अनुभवों पर आधारित हैं।
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