धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बिना क्यों तोड़ा अनशन? सोनम वांगचुक ने बताई पूरी वजह

HIGHLIGHTS
- सोनम वांगचुक ने 26 दिन बाद भूख हड़ताल खत्म की, केंद्र के लिखित आश्वासन के बाद लिया फैसला।
- वांगचुक ने कहा कि उनकी प्राथमिकता प्रदर्शनकारियों पर कानूनी कार्रवाई और एफआईआर से बचाना थी।
- शिक्षा सुधार, पेपर लीक और NEET मामले में संसद चर्चा व छात्रों के परिवारों को मुआवजे पर विचार का आश्वासन मिला।
नई दिल्ली। एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पूरी हुए बिना ही 26 दिनों से जारी अपनी भूख हड़ताल समाप्त करने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि उनका मुख्य उद्देश्य उन प्रदर्शनकारियों को किसी भी कानूनी कार्रवाई से बचाना था, जिन्होंने सोमवार को कथित परीक्षा अनियमितताओं को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के संसद चलो मार्च में हिस्सा लिया था।
59 वर्षीय वांगचुक ने गुरुवार आधी रात के बाद अपना अनशन खत्म किया। यह फैसला केंद्र सरकार की ओर से लिखित आश्वासन मिलने के बाद लिया गया। इसमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले दर्ज नहीं करने, संसद में परीक्षा सुधार और पेपर लीक के मुद्दे पर चर्चा करने तथा NEET पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने पर विचार करने की बात कही गई थी।
क्या है पूरा मामला?
सोनम वांगचुक 28 जून से व्यंग्यात्मक राजनीतिक समूह CJP के सदस्यों के समर्थन में अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे थे। यह प्रदर्शन दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जवाबदेही तय करने, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर किया जा रहा था।
हालांकि, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बिना अनशन खत्म करने को लेकर वांगचुक की आलोचना भी हुई। शुक्रवार देर रात जारी किए गए एक यूट्यूब वीडियो में उन्होंने बताया कि इस्तीफा उनकी मांगों में शामिल था, लेकिन केंद्र से बातचीत के दौरान उन्होंने इसे प्राथमिक मुद्दा नहीं बनाया। उनकी सबसे बड़ी चिंता प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और एफआईआर रोकना थी।
इस्तीफे को लेकर वांगचुक ने दी सफाई
अस्पताल के बिस्तर से रिकॉर्ड किए गए 24 मिनट के वीडियो में वांगचुक ने कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को अपने लिए जरूरी नहीं मानते। उन्होंने कहा कि इस्तीफा सरकार के लिए एक छोटा मुद्दा हो सकता है, लेकिन इसे नहीं देने से उसे नुकसान उठाना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि देशभर में उनकी छवि को लेकर लोगों में नाराजगी बढ़ रही है, लेकिन उन्हें भरोसा है कि धर्मेंद्र प्रधान आखिरकार इस्तीफा दे देंगे।
वांगचुक ने कहा कि उन्हें पहले से पता था कि केंद्र सरकार इस मुद्दे को लंबे समय तक नहीं टाल पाएगी और समय आने पर इस्तीफे का फैसला हो जाएगा। इसलिए उन्होंने बातचीत के दौरान इस मांग पर ज्यादा जोर नहीं दिया।
उन्होंने कहा, "मेरा ध्यान इस बात पर था कि छात्रों को परेशानी न हो। मेरी मुख्य चिंता कानूनी कार्रवाई और एफआईआर को लेकर थी। मुझे व्यक्तिगत तौर पर मंत्री का इस्तीफा सुरक्षित करना जरूरी नहीं लगा।"
डील के आरोपों पर दिया जवाब
सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार के साथ किसी भी तरह की डील होने के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य सिर्फ यह सुनिश्चित करना था कि प्रदर्शन में शामिल छात्रों को हिंसा या कानूनी कार्रवाई का सामना न करना पड़े।
उन्होंने बताया कि गुरुवार रात करीब 12 बजे उन्हें जानकारी दी गई कि मंत्री लिखित आश्वासन देने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली के हालात को देखते हुए वह जल्द फैसला लेना चाहते थे, क्योंकि उन्हें किसी बड़ी कार्रवाई की आशंका थी।
वांगचुक ने कहा कि अगर समझौता करना ही होता तो वह 26 दिनों तक भूख हड़ताल नहीं करते और दिल्ली की गर्मी में अनशन करने के बजाय किसी अन्य तरीके से बातचीत कर सकते थे।
लिखित आश्वासन के बाद तोड़ा अनशन
वांगचुक ने बताया कि केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ने गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में उनसे मुलाकात की। इस दौरान NEET पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने और परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही को लेकर संसद में चर्चा करने पर सकारात्मक विचार करने की बात कही गई।
उन्होंने कहा कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ किसी भी कार्रवाई नहीं किए जाने के लिखित आश्वासन पर अड़े रहे। शुरुआत में केंद्र केवल मौखिक आश्वासन देने को तैयार था, लेकिन उन्होंने लिखित आश्वासन मिलने तक अनशन खत्म नहीं किया।
वांगचुक ने बताया कि उन्हें उम्मीद थी कि अनशन खत्म करने के समय सांसद, CJP सदस्य और लद्दाख के प्रतिनिधि मौजूद रहेंगे, लेकिन उनका दावा है कि देर रात मंत्रियों के पहुंचने से पहले कई लोगों को उनसे मिलने की अनुमति नहीं दी गई।
उन्होंने कहा कि उन्हें सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि जब उन्होंने अनशन समाप्त किया, तब उनके साथी, छात्र और समर्थन करने आए सांसद वहां मौजूद नहीं थे।
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