गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग पर हाईकोर्ट सख्त, DGP से विचार करने को कहा

HIGHLIGHTS
- हाईकोर्ट ने जांच में उपलब्ध तकनीकी सुविधाओं के इस्तेमाल पर जोर दिया।
- जुलाई 2025 के पुलिस परिपत्र का भी अदालत ने उल्लेख किया।
- कोर्ट ने बयान विवेचक द्वारा खुद तैयार किए जाने की आशंका जताई।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों की जांच को अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक से गवाहों के बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार करने को कहा है। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने कहा कि इससे जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता और पारदर्शिता बढ़ेगी। इससे अदालतों को जमानत अर्जियों और अन्य न्यायिक कार्यवाहियों में भी सहायता मिलेगी।
अदालत ने यह निर्देश आगरा के बसौनी थाने में दर्ज दहेज हत्या के मामले में चंद्रकांता की जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए दिया। सुनवाई के दौरान विवेचक सहायक पुलिस आयुक्त अनिल कुमार अदालत में उपस्थित थे। उन्होंने स्वीकार किया कि प्रथम सूचनाकर्ता का बयान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180 के तहत दर्ज करते समय उसकी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की गई थी। इसके बाद विवेचक ने अदालत के सामने बिना शर्त माफी मांगी।
कई मामलों में बयान दर्ज करने की प्रक्रिया पर उठे सवाल
हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180 की उपधारा (3) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता नियमावली, 2024 के नियम 20(1) के तहत विवेचक को गवाहों के बयान ऑडियो-वीडियो माध्यम से रिकॉर्ड करने की अनुमति है। जुलाई 2025 में पुलिस महानिदेशक की ओर से जारी परिपत्र के तहत दुष्कर्म पीड़िता के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य की गई थी, जबकि अन्य मामलों में इसे वैकल्पिक रखा गया था।
अदालत ने कहा कि उसके सामने ऐसे कई मामले आए हैं, जहां सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद विवेचकों ने गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की। कोर्ट के मुताबिक, ऐसी स्थिति में यह आरोप लगने की संभावना रहती है कि बयान विवेचक ने खुद तैयार किया है या प्राथमिकी में दर्ज बातों को ही बयान के तौर पर लिख दिया गया है। अदालत ने इस विकल्प के दुरुपयोग की आशंका पर भी चिंता जताई।
पुलिस का उद्देश्य सजा दिलाना नहीं, निष्पक्ष जांच करना
अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस का काम सिर्फ आरोपी को सजा दिलाना नहीं है। पुलिस की जिम्मेदारी निष्पक्ष तरीके से जांच कर वास्तविक तथ्यों को सामने लाना है, ताकि दोषी को कानून के अनुसार सजा मिले और निर्दोष व्यक्ति को गलत जांच के कारण परेशानी का सामना न करना पड़े।
इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने विवेचकों के लिए कई दिशा-निर्देश भी दिए। इनमें घटना की सूचना मिलने के बाद जल्द मौके पर पहुंचना, उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखना, आवश्यक मामलों में मोबाइल और विधि-विज्ञान संबंधी साक्ष्य जुटाना तथा जरूरत के अनुसार पहचान की कार्रवाई करना शामिल है।
अदालत ने यह भी कहा कि जिन मामलों में मोबाइल में मौजूद सामग्री, बातचीत या किसी व्यक्ति की स्थिति जांच के लिए महत्वपूर्ण हो, वहां संबंधित डिजिटल साक्ष्यों और दूरभाष विवरण का निष्पक्ष तरीके से संकलन किया जाना चाहिए। आपत्तिजनक वीडियो से जुड़े मामलों में भी मोबाइल और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की विधिवत जांच करने के निर्देश दिए गए हैं।
दहेज हत्या के मामले में सास को मिली जमानत
चंद्रकांता ने आगरा के बसौनी थाने में दर्ज दहेज से जुड़े मामले में जमानत के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। अदालत ने प्राथमिकी और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180 के तहत दर्ज बयान के बीच अंतर पाया। साथ ही कोर्ट ने माना कि आवेदिका पर लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं तथा मृतका की मौत से पहले उसके साथ दहेज उत्पीड़न किए जाने के पर्याप्त प्रथमदृष्टया साक्ष्य सामने नहीं आए हैं।
चंद्रकांता का कोई आपराधिक इतिहास नहीं होने और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने उसे सशर्त जमानत दे दी। आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को भेजने का निर्देश भी दिया गया है, ताकि जांच से जुड़े दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।
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