मुजफ्फरनगर: 'जज के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए', फांसी की 23 सजा सुनाने वाले जज ने बयां किया दर्द

HIGHLIGHTS
- अदालत ने साक्ष्य के अभाव में अशोक भारत को दोषमुक्त किया।
- फैसले में ‘तारीख पर तारीख’ संवाद का भी उल्लेख हुआ।
- 97 पत्रावलियों को रिकॉल किए जाने का मामला सामने आया।
मुजफ्फरनगर की अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या-3/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने बृहस्पतिवार को एनडीपीएस एक्ट के करीब 10 साल पुराने मामले में फैसला सुनाया। अदालत ने पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर आरोपी अशोक भारत को दोषमुक्त कर दिया।
फैसले के दौरान न्यायाधीश ने न्याय व्यवस्था से जुड़े कई सवाल भी उठाए। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश का दायित्व न्याय करना है, लेकिन अगर उसके साथ ही अन्याय हो तो वह कहां जाएगा। उन्होंने यह सवाल भी रखा कि जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करने वाला न्यायाधीश क्या ऐसे आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य है, जिन्हें वह कानून के विपरीत मानता है।
10 साल पुराने मामले में अशोक भारत दोषमुक्त
अदालत ने बृहस्पतिवार को एनडीपीएस एक्ट के लगभग 10 साल पुराने मामले में अशोक भारत को साक्ष्यों के अभाव में दोषमुक्त कर दिया। फैसले में न्यायालय ने फिल्म ‘दामिनी’ के ‘तारीख पर तारीख’ वाले संवाद का भी उल्लेख किया।
न्यायाधीश ने कहा कि एक निर्दोष व्यक्ति को न्याय मिलने में लंबा समय लगा। इसी फैसले में उन्होंने अपनी अदालत से 18 अगस्त को ट्रांसफर की गई हत्या के मामलों की 97 पत्रावलियों को लेकर भी सवाल उठाए।
97 पत्रावलियों के रिकॉल का जिक्र
फैसले में बताया गया कि तत्कालीन जनपद न्यायाधीश ने 18 अगस्त को एक ही प्रकार के कुल नौ आदेश जारी किए थे। इन आदेशों के माध्यम से अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/एफटीसी कोर्ट संख्या-3, मुजफ्फरनगर में चल रहे मामलों की पत्रावलियों को विधि के अनुसार निस्तारण के लिए जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मुजफ्फरनगर की अदालत में रिकॉल किया गया था।
रिटायरमेंट से 13 दिन पहले 97 पत्रावलियों का रिकॉल
न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने फैसले में कहा कि तत्कालीन जनपद न्यायाधीश ने इन 97 पत्रावलियों को अपने न्यायालय में अपने सेवानिवृत्त होने से केवल 13 दिन पहले रिकॉल किया था। फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि पत्रावलियों को वापस मंगाने का कोई कारण नहीं बताया गया।
इसी कार्रवाई के संदर्भ में न्यायाधीश ने जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण और ऐसे आदेशों को लेकर सवाल उठाए, जिन्हें वह कानून के विपरीत मानते हैं।
155 दिन में 10 मामलों में 23 दोषियों को फांसी की सजा
फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने छह अप्रैल से सात सितंबर तक 155 दिनों में 10 मामलों में 23 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है। इसे मुजफ्फरनगर में न्यायालय की स्थापना के 70 साल के इतिहास में रिकॉर्ड बताया गया है।
12 अप्रैल 1956 को मेरठ से विभाजन के बाद मुजफ्फरनगर में अस्थायी न्यायालय की शुरुआत हुई थी। इसके बाद 14 जुलाई 1958 को यहां स्थायी रूप से काम शुरू हुआ। इसी वर्ष छह अप्रैल से सात सितंबर के बीच 155 दिनों में फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने न्याय का नया अध्याय जोड़ा। 10 मामलों में अब तक 2 लोगों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है।
इन मामलों में सुनाया गया फैसला
1. एडवोकेट समीर सैफी हत्याकांड (6 अप्रैल 2026):
15 अक्टूबर 2019 को 40 लाख रुपये के लेन-देन के विवाद में अधिवक्ता समीर सैफी की हत्या कर दी गई थी। अदालत ने सिंगोल अल्वी, सोनू उर्फ रिजवान और शालू उर्फ अरबाज को मृत्युदंड की सजा सुनाई। एक अन्य दोषी दिनेश को सात वर्ष के कारावास की सजा दी गई।
2. शेखर हत्याकांड (28 अप्रैल 2026):
भौराकलां थाना क्षेत्र के सिसौली निवासी शेखर की वर्ष 2019 में 70 हजार रुपये के लेन-देन के विवाद में पास के गांव खेड़ी सूंडियान में हत्या हुई थी। अदालत ने दोषी मुकेश, उसके बेटे प्रदीप, संदीप और सोनू को मृत्युदंड सुनाया।
3. राजेश देवी-हिमांशु हत्याकांड (30 मई 2026):
छपार के सलेमपुर गांव निवासी सुरेश की पत्नी राजेश देवी नवंबर 2011 में अपने छह वर्षीय बेटे हिमांशु के साथ घर से निकली थीं। दोनों के शव चरथावल में मिले थे। हत्या के इस मामले में अदालत ने दोषी रईस को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
4. राजेंद्र सैनी हत्याकांड (20 जून 2026):
ककरौली निवासी राजेंद्र सैनी की वर्ष 2018 में हत्या करने के बाद शव जलाने के मामले में अदालत ने रामकरण उर्फ सावन गिरी और गीलू को मृत्युदंड दिया। मामले के एक आरोपी वीरसैन की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी थी।
5. होमगार्ड रतिराम हत्याकांड (2 जुलाई 2026):
शहर कोतवाली के बुढ़ाना मोड़ पर वर्ष 2020 में गश्त के दौरान होमगार्ड रतिराम की चाकू मारकर हत्या की गई थी। शुरुआत में मामला जानलेवा हमले में दर्ज हुआ था, लेकिन होमगार्ड की मौत के बाद हत्या की प्राथमिकी दर्ज की गई। अदालत ने दोषी दीपक को मृत्युदंड सुनाया।
6. राजबीर सिंह हत्याकांड (6 जुलाई 2026):
तितावी थाना क्षेत्र के मांडी गांव में प्रधान पद की रंजिश के चलते राजबीर सिंह (60) की वर्ष 2010 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अदालत ने दोषी पूर्व प्रधान प्रमोद कुमार और प्रधान पद के प्रत्याशी रहे सहदेव उर्फ पप्पू को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
7. राज सिंह हत्याकांड (17 जुलाई 2026):
शामली के कुड़ाना गांव के पास किसान राज सिंह (48) की 20 अगस्त 2011 को लूट के बाद लाठी-डंडों से पीटकर और गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अदालत ने बहावड़ी गांव निवासी अजीत, सूरज उर्फ काला, वहलना निवासी अनिल और देवरिया के घुसवा रामपुर निवासी सुनील को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
8. सालिम हत्याकांड (12 अगस्त 2026):
9 दिसंबर 1999 की रात आठ ट्रैक्टर चालक हारुण का रजबहे की पटरी से अपहरण किया गया था। फिरौती की चिट्ठी मिलने के बाद उसके किसान पिता सालिम बदमाशों के बताए स्थान पर पहुंचे। बदमाशों ने सालिम को अपने कब्जे में ले लिया और रकम की व्यवस्था करने के लिए हारुण को छोड़ दिया। बाद में 25 जनवरी 2000 को सालिम की हत्या कर दी गई।
9. पवन हत्याकांड (13 अगस्त 2026):
शामली के कांधला थाना क्षेत्र के भभीसा गांव में 14 जुलाई 2014 को घर पर हमला कर किसान पवन कुमार की दो गोलियां मारकर हत्या कर दी गई थी। उसका भाई अशोक घायल हुआ था। अदालत ने भभीसा निवासी राहुल उर्फ बोसी, कांजरहेड़ी गांव निवासी हरेंद्र कुमार, पीरखेड़ा निवासी रामवीर और बागपत के बड़ौत निवासी राजीव उर्फ छोटू को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
10. शहजादी की हत्या (7 सितंबर 2026):
बागपत के निवाड़ा निवासी शहजादी का निकाह 10 जनवरी 2015 को शाहपुर की नई आबादी निवासी नदीम से हुआ था। 23 जुलाई 2018 को रात करीब साढ़े आठ बजे उसके साथ मारपीट की गई और मिट्टी का तेल (केरोसिन) डालकर आग लगा दी गई। सफदरजंग अस्पताल में उपचार के दौरान 28 जुलाई 2018 को उसकी मौत हो गई। अदालत ने दोषी पति को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
जज रवि कुमार दिवाकर ने क्या तर्क दिए?
न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने कहा कि धारा 449 के तहत सेशन जज/जिला जज को प्रशासनिक अधिकार प्राप्त है। इसके तहत वह मातहत अदालतों से मुकदमों की फाइलें वापस मंगाकर खुद उनकी सुनवाई कर सकते हैं या उन्हें किसी दूसरी अदालत को सौंप सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि इसी धारा के उप-खंड 449(2) के अनुसार, यदि किसी मामले की सुनवाई यानी गवाही या जिरह शुरू हो चुकी है और वह ‘पार्ट हर्ड’ की श्रेणी में आ गया है, तो जिला जज के पास उसे असाधारण विधिक कारणों के बिना बीच में वापस मंगाने यानी रिकॉल करने का अधिकार नहीं होता।






















Reader comments
No comments yet
Be the first to share your perspective on this story.