उज्जैन में संघ प्रमुख का युवाओं को संदेश, बोले- धर्म बांधता नहीं, मुक्त करता है

HIGHLIGHTS
- कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और वंदे मातरम से हुई।
- धर्म संसद में करीब 1,700 युवा छात्र-छात्राएं शामिल हैं।
- 300 से अधिक विद्वान, शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्य भी पहुंचे।
उज्जैन। देवास रोड स्थित गीता भवन में आयोजित तीन दिवसीय युवा धर्म संसद के दूसरे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने दीप प्रज्वलित कर और वंदे मातरम के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की। इस दौरान उन्होंने युवाओं के सामने धर्म के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट किया और जीवन में इसके महत्व पर मार्गदर्शन दिया।
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने रिलीजन और धर्म के बीच अंतर समझाते हुए कहा कि रिलीजन का मतलब धर्म नहीं है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी शब्दकोश में धर्म के लिए कोई सटीक शब्द उपलब्ध नहीं है। उनके मुताबिक, रिलीजन शब्द की उत्पत्ति 'रिलिजियो' से हुई है, जिसका अर्थ बांधने से जुड़ा है, जबकि धर्म किसी को बांधता नहीं बल्कि मुक्ति का मार्ग दिखाता है।
उन्होंने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति धर्म के कर्मकांड को खत्म करना चाहती है और इसी वजह से इसे रिलीजन कहा जाता है। स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत धर्मप्राण देश है। किसी नए विचार या जिज्ञासा का समाधान तलाशने के लिए पहले मन को स्थिर और खाली करना जरूरी है। जब तक दिमाग में पहले से मौजूद बातें नहीं हटेंगी, तब तक नया सीखना संभव नहीं होगा।
युवा धर्म संसद में देशभर से करीब 1,700 युवा छात्र-छात्राएं और 300 से अधिक विद्वान, शिक्षक, शोधकर्ता व धर्माचार्य हिस्सा ले रहे हैं। प्रसिद्ध पटकथा लेखक और गीतकार मनोज मुंतशिर भी कार्यक्रम में शामिल हुए। यहां धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा, एआई और सूचना-विचार संघर्ष जैसे समसामयिक विषयों पर संवाद और व्याख्यान आयोजित किए जा रहे हैं।
धर्म युवाओं को देता है सही दिशा
कार्यक्रम में मोहन भागवत ने कहा कि धर्म केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि युवाओं को भी सही दिशा देने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि महाभारत के अंत के पांच श्लोक पूरी महाभारत का सार हैं। उनके अनुसार, जीवन में धर्म के माध्यम से ही काम, अर्थ और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
उन्होंने कहा कि धर्म को लेकर रोते हुए आगे बढ़ने के बजाय यदि उसे समझकर जीवन में अपनाया जाए तो जीवन सार्थक हो सकता है। उन्होंने कहा कि किसी को पीड़ा नहीं देना सबसे बड़ा धर्म है, जबकि पीड़ा देना महापाप है।
द्वारका में होगा युवा धर्म संसद का अगला संस्करण
सेवाज्ञ संस्थानम् द्वारा सिद्धपीठ हनुमत निवास, अयोध्या के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण जी महाराज के मार्गदर्शन में युवा धर्म संसद का छठा संस्करण आयोजित किया जा रहा है। इससे पहले काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार और कांचीपुरम में इसके आयोजन हो चुके हैं। अब इसका अगला संस्करण द्वारका में आयोजित किया जाएगा।
उद्घाटन सत्र में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. श्रीनिवास बरखेड़ी और सेवाज्ञ संस्थानम् के अध्यक्ष आशीष कुमार आशु मौजूद रहे। वहीं, व्याख्यान सत्रों में जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरिजी महाराज, अनादि फाउंडेशन की सह-संस्थापिका स्मृति अनंतलक्ष्मी और प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंद कुमार युवाओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
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