महिला नियुक्तियों के नियमों को झारखंड हाईकोर्ट ने दी हरी झंडी, अब प्रक्रिया जारी

रांची: झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की पीठ ने महिला सुपरवाइजर पदों पर केवल महिलाओं की नियुक्ति से जुड़े नियमों को संवैधानिक माना है। अदालत ने इस पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया पर लगी अंतरिम रोक को भी हटा दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला आरक्षण की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाने वाला नहीं था, क्योंकि इसे चुनौती देने वाली प्रार्थी स्वयं महिलाएं थीं। अदालत ने कहा कि यह पद विशेष रूप से एकीकृत बाल विकास सेवा योजना के अंतर्गत गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों की देखभाल को ध्यान में रखते हुए महिलाओं के लिए बनाया गया है और इसे कार्य की प्रकृति व लक्षित समूह के आधार पर उचित वर्गीकरण माना जाना चाहिए।
अदालत ने शैक्षणिक योग्यता से जुड़े मुद्दों की सुनवाई के लिए मामला एकल पीठ को सौंप दिया है। साथ ही आदेश दिया गया कि नियुक्ति पत्र में यह उल्लेख होना चाहिए कि एकल पीठ के अंतिम निर्णय से नियुक्ति प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 15(3) के तहत राज्य सरकार महिलाओं के लिए विशेष प्रविधान कर सकती है, और यह शक्ति अनुच्छेद 16 द्वारा सीमित नहीं होती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा मुख्य रूप से पिछड़े वर्गों के लिए अनुच्छेद 16(4) के तहत लागू होती है और यह मामला उस श्रेणी में नहीं आता।
इससे पहले जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने 28 अगस्त 2025 को यह कहते हुए नियुक्तियों पर रोक लगा दी थी कि 100 प्रतिशत आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन कर सकता है।
प्रार्थियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार, चंचल जैन और अमृतांश वत्स ने पक्ष रखा, जबकि अधिवक्ता अनूप कुमार मेहता न्याय मित्र के रूप में अदालत की मदद कर रहे थे।
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