एनआईए अदालत ने लश्कर-ए-तैयबा केस में दो आरोपियों को 15-15 साल की सजा सुनाई

नई दिल्ली। पटियाला हाउस स्थित विशेष एनआईए अदालत ने आतंकवाद से जुड़े एक गंभीर मामले में जहूर अहमद पीर और नजीर अहमद पीर को 15-15 वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने पाया कि दोनों ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के पाकिस्तानी आतंकी बहादुर अली को भारत में घुसपैठ करने के बाद पनाह, भोजन और अन्य आवश्यक मदद उपलब्ध कराई थी।
विशेष एनआईए न्यायाधीश प्रशांत शर्मा ने दोनों को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धाराओं 18, 19 और 39 के तहत दोषी करार दिया। अदालत ने पहले ही 18 दिसंबर 2025 को दोनों को अपराधी पाया था और अब अंतिम सजा सुनाई गई। न्यायाधीश ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने आरोपों को संदेह से परे साबित किया है।
अदालत के फैसले में कहा गया कि दोनों आरोपी आतंकवादी साजिश रचने, प्रतिबंधित संगठन के सदस्य को पनाह देने और लश्कर-ए-तैयबा को समर्थन देने के दोषी हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड में ऐसे कोई साक्ष्य नहीं हैं जो आरोपियों की बेगुनाही सिद्ध करते हों।
जुलाई 2016 में दर्ज हुआ था मामला
जांच के अनुसार, जुलाई 2016 में एनआईए ने भारत में आतंकवादी हमलों की योजना के सिलसिले में मामला दर्ज किया था। जांच में यह सामने आया कि बहादुर अली अन्य आतंकियों के साथ 2016 में बुरहान वानी की मौत के बाद भारत में आतंकी वारदातें अंजाम देने के इरादे से घुसपैठ कर आया था। सुरक्षा बलों की कार्रवाई में उसके साथ आए अन्य आतंकियों को मार गिराया गया, जबकि बहादुर अली को पकड़ लिया गया।
घुसपैठ के बाद, स्थानीय स्तर पर उसे पनाह, भोजन और अन्य जरूरी सहायता दी गई। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि जहूर और नजीर को यह जानकारी थी कि बहादुर अली लश्कर-ए-तैयबा का सदस्य है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उसकी मदद की।
इससे पहले मार्च 2021 में बहादुर अली ने अपने अपराध को स्वीकार कर लिया था और उसे आतंकी साजिश के आरोप में 10 वर्ष की कारावास की सजा सुनाई गई थी।
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