उमर अब्दुल्ला के बचाव में बोलीं सकीना इट्टू- चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे CM, पार्टी ने किया मजबूर

HIGHLIGHTS
- सकीना इट्टू ने कहा कि उमर अब्दुल्ला पूरी गंभीरता और निष्ठा से जनता की उम्मीदें पूरी करने में जुटे हैं।
- आगा सैयद रुहुल्ला ने कहा कि उमर अब्दुल्ला पर चुनाव लड़ने का कोई दबाव नहीं था।
- सरकारी कर्मचारियों, दैनिक वेतनभोगियों, एमबीबीएस इंटर्न और पशु चिकित्सकों के आंदोलनों का भी जिक्र किया गया।
जम्मू। जम्मू-कश्मीर की सत्ता को लेकर राजनीतिक खींचतान अब केवल विपक्ष के हमलों तक सीमित नहीं रह गई है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की अगुवाई वाली सरकार के खिलाफ सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर से भी आवाजें उठ रही हैं। इससे सरकार के सामने मौजूद राजनीतिक असहजता खुलकर सामने आने लगी है। सरकार अब तक जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश होने और सीमित अधिकारों का हवाला देकर कई मुद्दों पर अपना पक्ष रखती रही है।
मुख्यमंत्री के बचाव में समाज कल्याण एवं स्वास्थ्य शिक्षा मंत्री सकीना इट्टू ने कहा कि उमर अब्दुल्ला चुनाव लड़ना नहीं चाहते थे और पार्टी ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए मजबूर किया था। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक विवाद और बढ़ गया। हालांकि, नेशनल कॉन्फ्रेंस के बागी सांसद आगा सैयद रुहुल्ला ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए इसे खारिज किया।
सकीना इट्टू के मुताबिक मुख्यमंत्री पूरी गंभीरता और निष्ठा के साथ जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन केंद्र शासित प्रदेश के मुख्यमंत्री के पास अधिकार सीमित हैं। उनका कहना है कि इन्हीं सीमाओं की वजह से सरकार कई मामलों में प्रभावी तरीके से फैसले लेने की स्थिति में नहीं है।
रुहुल्ला ने चुनाव लड़ने को लेकर उठाए सवाल
बागी सांसद आगा सैयद रुहुल्ला ने कहा कि उमर अब्दुल्ला पर चुनाव लड़ने का कोई दबाव नहीं था। उन्होंने दावा किया कि वह खुद उस प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं, जिसमें पार्टी उम्मीदवारों और चुनावी रणनीति को अंतिम रूप दिया गया था।
रुहुल्ला ने सवाल उठाया कि जब उमर अब्दुल्ला को पहले से मालूम था कि मुख्यमंत्री के तौर पर उनके पास सीमित अधिकार होंगे, तो उन्होंने मुख्यमंत्री पद स्वीकार क्यों किया। उनका कहना है कि अब अधिकार सीमित होने का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश को जनता स्वीकार नहीं करेगी।
सरकार के सामने चुनौतियां केवल राजनीतिक बयानों तक सीमित नहीं हैं। सरकारी कर्मचारियों, दैनिक वेतनभोगियों, एमबीबीएस इंटर्न और पशु चिकित्सकों के आंदोलनों ने भी सरकार के सामने मुश्किलें बढ़ाई हैं।
आरक्षण को युक्तिसंगत बनाने, 200 यूनिट मुफ्त बिजली के चुनावी वादे और कर्मचारियों की मांगों जैसे मुद्दों को लेकर सरकार लगातार सवालों के घेरे में है। विरोधियों का आरोप है कि जनता से जुड़े इन मुद्दों का समाधान करने के बजाय सरकार सीमित अधिकारों का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से बच रही है।
सरकार की कार्यशैली पर पार्टी के भीतर से भी सवाल
सरकार के लिए चिंता की बात यह है कि उसकी आलोचना अब पार्टी के भीतर और उसके करीबी माने जाने वाले नेताओं की ओर से भी सामने आ रही है। अनंतनाग-राजौरी से लोकसभा सदस्य और नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता मियां अल्ताफ ने भी प्रदेश की राजनीतिक स्थिति को चिंताजनक बताया है। उन्होंने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए माना कि कई मामलों में सरकार जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने में विफल रही है।
रुहुल्ला ने सरकार पर जनता से दूरी बनाने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि यदि हर समस्या का समाधान सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, तब भी जिन मुद्दों पर उसके पास अधिकार हैं, उन पर कार्रवाई की जा सकती है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा सैयद रुहुल्ला ने कैबिनेट सहयोगी सकीना इट्टू की मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के चुनावी भविष्य को लेकर की गई टिप्पणी को खारिज करते हुए कहा कि इस तरह के बयान सही परिप्रेक्ष्य में नहीं दिए गए होंगे।
इटू के बयान पर रुहुल्ला की प्रतिक्रिया
सकीना इट्टू की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए रुहुल्ला ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों से जुड़े मुद्दों पर उनका रुख सिद्धांतों पर आधारित है और इसके पीछे चुनावी गणना नहीं है। श्रीनगर के सांसद ने कहा कि वह हमेशा लोगों की वास्तविक आकांक्षाओं और अधिकारों के लिए आवाज उठाते रहे हैं और चुनावी प्रयासों या राजनीतिक परिणामों की परवाह किए बिना आगे भी ऐसा करते रहेंगे।
इससे पहले स्वास्थ्य एवं शिक्षा मंत्री सकीना इट्टू ने मुख्यमंत्री के आवास के बाहर रुहुल्ला के विरोध प्रदर्शन को “सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश” बताया था। उन्होंने इस दौरान उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार का बचाव भी किया था।
इन टिप्पणियों के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर आरक्षण नीति और जनता की शिकायतों को लेकर पार्टी के रुख समेत कई मुद्दों पर बढ़ते मतभेद सामने आए हैं।
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