श्रीलंका ने 19 ईरानी तेल टैंकरों की मदद से किया इनकार, अमेरिकी प्रतिबंधों का डर

HIGHLIGHTS
- श्रीलंका के तट के पास करीब 47 विदेशी जहाज मौजूद हैं, जिनमें 19 ईरानी हैं।
- विदेश मंत्रालय ने सहायता पर विचार करने से पहले राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की बात कही।
- ईरानी टैंकरों पर भोजन, पीने के पानी और ईंधन की भारी कमी हो गई है।
कोलंबो। श्रीलंका ने स्पष्ट किया है कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में फंसे 19 ईरानी तेल टैंकरों की मदद करने की उसकी फिलहाल कोई योजना नहीं है। इन जहाजों पर भोजन, पीने के पानी और ईंधन की भारी कमी हो गई है।
राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा श्रीलंका: विदेश मंत्रालय
9 अक्टूबर को कोलंबो में पत्रकारों से बातचीत के दौरान श्रीलंका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि किसी भी तरह की सहायता पर विचार करने से पहले देश के राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि जहाजों को रसद और अन्य आपूर्ति उपलब्ध कराने वाली कंपनियां इस बात से अच्छी तरह परिचित हैं कि उन्हें अमेरिका के 'सेकेंडरी प्रतिबंधों' का सामना करना पड़ सकता है।
यह बयान वॉल स्ट्रीट जर्नल की उस रिपोर्ट के बाद आया, जिसमें दावा किया गया था कि अमेरिकी अधिकारियों ने श्रीलंका के प्रशासन पर स्थानीय शिपिंग कंपनियों को ईरानी टैंकरों तक सहायता पहुंचाने से रोकने के लिए दबाव डाला था।
हालांकि, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ने श्रीलंका की ओर से सहायता दिए जाने पर प्रतिबंध लगाने का कोई सीधा संकेत नहीं दिया है। इसके बावजूद अमेरिकी सेकेंडरी प्रतिबंधों की आशंका कोलंबो के फैसलों को प्रभावित करती दिखाई दे रही है।
श्रीलंका के सामने चुनौती केवल यह तय करने की नहीं है कि वह फंसे हुए ईरानी जहाजों की मदद करे या नहीं। सवाल यह भी है कि अमेरिकी सेकेंडरी प्रतिबंधों के खतरे के बीच वह अपनी विदेश नीति से जुड़े फैसले कितनी स्वतंत्रता से ले सकता है।
श्रीलंका के पास कैसे फंसे ईरानी जहाज?
28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ संयुक्त हमले किए, जिसके बाद मध्य पूर्व में युद्ध शुरू हो गया। जवाब में ईरान ने इजराइल पर हमले किए और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया।
मार्च में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी कर दी। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी लागू कर दी। बाद में इस नाकेबंदी को हटा लिया गया, लेकिन जुलाई में इसे दोबारा लागू कर दिया गया।
इस कदम के बाद दर्जनों ईरानी जहाज श्रीलंका और उसके पड़ोसी देशों के तटों के आसपास फंस गए। इन जहाजों के लिए अपने देश लौटना संभव नहीं हो सका।
श्रीलंका के तट के पास 47 विदेशी जहाज
श्रीलंका के विदेश मंत्री विजिथा हेराथ के अनुसार, देश के तट के पास इस समय करीब 47 विदेशी जहाज मौजूद हैं। इनमें 19 जहाज ईरान के हैं।
हेराथ ने बताया कि ये सभी जहाज श्रीलंका के विशेष आर्थिक क्षेत्र (एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन) के भीतर हैं, लेकिन देश की 12 नॉटिकल मील की क्षेत्रीय जलसीमा से बाहर स्थित हैं।
कानूनी और नैतिक दुविधा में कोलंबो
संयुक्त राष्ट्र में श्रीलंका के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि दयान जयतिलेका ने माना कि कोलंबो एक कठिन स्थिति का सामना कर रहा है। उनके अनुसार, श्रीलंका जानबूझकर सहायता से इनकार नहीं कर रहा है, लेकिन कुछ परिस्थितियों के कारण उसे बेहद सावधानी से कदम उठाने पड़ रहे हैं।
क्या होते हैं अमेरिकी सेकेंडरी प्रतिबंध?
सेकेंडरी प्रतिबंध किसी सरकार की ओर से उन तीसरे पक्षों पर लगाए जाते हैं, जो मुख्य प्रतिबंधित देश के साथ व्यापार करते हैं। अमेरिका वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की केंद्रीय भूमिका का इस्तेमाल करते हुए विदेशी संस्थाओं को अपनी नीतियों का पालन करने के लिए बाध्य करता है।
यदि कोई विदेशी कंपनी प्रतिबंधित देश के साथ व्यापार करती है, तो उसे अमेरिकी वित्तीय प्रणाली और बाजार से बाहर किया जा सकता है।
24 अगस्त को अमेरिका ने 'ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट' की घोषणा की थी। यह ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों की श्रृंखला में एक नया कदम था। इससे ईरान के साथ व्यापार करने या उसे शिपिंग सेवाएं देने वाली विदेशी संस्थाओं के लिए सेकेंडरी प्रतिबंधों का जोखिम बढ़ गया है।
इसी आशंका के चलते श्रीलंका की निजी शिपिंग कंपनियां ईरानी टैंकरों को रसद और जरूरी सामग्री उपलब्ध कराने से बच रही हैं।
अमेरिका की अनदेखी करना श्रीलंका के लिए क्यों मुश्किल?
श्रीलंका के लिए अमेरिकी चेतावनियों या संकेतों को नजरअंदाज करना आर्थिक रूप से नुकसानदेह साबित हो सकता है। वर्ष 2025 में श्रीलंकाई कंपनियों ने अमेरिका को 2,999 मिलियन डॉलर का सामान निर्यात किया, जबकि अमेरिका से 544 मिलियन डॉलर का आयात किया।
श्रीलंका के कुल वैश्विक निर्यात में अकेले अमेरिका की हिस्सेदारी 24 प्रतिशत यानी करीब एक-चौथाई है। ऐसे में अमेरिकी बाजार तक पहुंच बंद होने से लाखों नौकरियों पर खतरा पैदा हो सकता है।
1948 में आजादी मिलने के बाद श्रीलंका के सबसे गंभीर आर्थिक संकट के दौरान अमेरिका ने उसे आर्थिक और मानवीय सहायता दी थी। इसके अलावा, मार्च 2023 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से मिले 3 अरब डॉलर के चार वर्षीय बेलआउट पैकेज को मंजूरी दिलाने में भी वाशिंगटन ने कोलंबो की अहम मदद की थी।
श्रीलंका के समुद्री उद्योग पर भी मंडरा रहा खतरा
हिंद महासागर के रणनीतिक समुद्री मार्ग पर स्थित श्रीलंका एक प्रमुख समुद्री केंद्र है। हालांकि, उसका समुद्री उद्योग अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीतिक स्थिरता पर निर्भर करता है। इस क्षेत्र का देश की जीडीपी में करीब 2.5 प्रतिशत योगदान है।
समुद्री क्षेत्र में प्रत्यक्ष रूप से 40,000 से 50,000 लोगों को पूर्णकालिक रोजगार मिलता है। इस क्षेत्र की लगभग 70 प्रतिशत कंपनियां श्रीलंका की स्थानीय कंपनियां हैं, जबकि बाकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं। देश में 130 शिपिंग एजेंसियां सक्रिय हैं।
यदि श्रीलंकाई कंपनियां अमेरिकी प्रतिबंधों की चपेट में आती हैं, तो इससे देश के समुद्री उद्योग और भविष्य की योजनाओं को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है।
ईरानी तेल टैंकरों से जुड़ा यह मामला अमेरिका, ईरान और श्रीलंका के त्रिपक्षीय कूटनीतिक संबंधों को प्रभावित कर सकता है। साथ ही, यह वैश्विक मंच पर श्रीलंका जैसे कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देश की स्वतंत्र विदेश नीति और मानवीय सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाने की क्षमता की भी परीक्षा है।
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